मध्य प्रदेश विधान सभा चुनाव 2018, ब्रांड शिवराज की कसौटी

Shivraj Singh Chouhan, pic courtesy MP BJP

2018 MP Assembly election a test for Brand Shivraj

NK SINGH

२००३ के विधान सभा चुनाव प्रचार की आखिरी शाम. कार ओरछा के रास्ते गड्ढों में हिचकोले ले रही थी. रात के अँधेरे को चीरती हेडलाइट की रोशनी सड़क के किनारे पड़े गिट्टी के ढेरों पर पड़ी. दिग्विजय सिंह उस तरफ इशारा करते हुए बोले, “चुनाव के बाद सड़क का काम शुरू हो जायेगा.”

सड़क की मरम्मत तो हुई. पर तबतक दिग्विजय सिंह मुख्य मंत्री नहीं थे. उनकी जगह उमा भारती आ गयी थीं.

लालू यादव से प्रभावित दिग्विजय सिंह का खयाल था कि डेवलपमेंट से वोट नहीं मिलते. पर उनकी सोशल इंजीनियरिंग धरी की धरी रह गयी. दलित एजेंडा का पांसा उल्टा पड़ गया. गांवों में सवर्ण और ओबीसी लामबंद हो गए.

पर उस चुनाव में कांग्रेस की करारी हार के पहले दिग्विजय सिंह ने एक और काम किया था —- मध्य प्रदेश को दो हिस्सों में बाँटने का. आनन-फानन में असेंबली से प्रस्ताव पास करा कर सन २००० में छत्तीसगढ़ बना.

नए राज्य ने न केवल मध्य प्रदेश का राजनीतिक भूगोल बदल दिया बल्कि उसके राजनीतिक इतिहास को भी प्रभावित किया.

पहले प्रदेश में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच वोटों का अंतर आम तौर पर एक से तीन प्रतिशत के बीच हुआ करता था. पर छत्तीसगढ़ बनने के बाद वह बढ़कर ८ % से भी ज्यादा हो गया.

२००३ की हार के बाद कांग्रेस लगातार कमजोर होती चली गयी और भाजपा मजबूत. कांग्रेस के वोटों में लगभग ६ % की गिरावट आई.

दूसरी तरफ, भाजपा के विधायकों जीतने का औसत मार्जिन बढ़कर दोगुने से ज्यादा हो गया. भाजपा का जनाधार बढ़ा ही, उसने नए इलाकों पर भी कब्ज़ा किया. अपने पारंपरिक गढ़ मालवा-निमाड़ और मध्य भारत के साथ-साथ वह महाकौशल और बुंदेलखंड में भी मजबूत होकर उभरी.

मध्य प्रदेश में राजनीति की धूरी कांग्रेस से खिसककर भाजपा के पास आ गयी है. पिछले कुछ चुनावों के आंकड़े देखें तो भाजपा को सत्ता से हटाना तभी मुमकिन है अगर उसके खिलाफ कोई कोई हवा चले. Continue reading “मध्य प्रदेश विधान सभा चुनाव 2018, ब्रांड शिवराज की कसौटी”

Atal Bihari Vajpayee: Out But Not Down

NK SINGH

 

Mujhe door ka dikhayi deta hai,

Mein deewar par likha padh sakta hoon,

Magar haath ki rekhayen nahin padh sakta.

(I can see far ahead,

I can read the writing on the wall,

But I cannot read the lines on my own palm.)

-A poem written by Atal Bihari Vajpayee on his birthday in 1993.

If politics is the art of the possible, what the BJP tried to achieve was virtually the impossible. The party’s failure to win over even one additional MP-its strength on May 28 stood at 194, the same as when its government was sworn in on May 16-demonstrated its inability to read the signals: that the new liberal mask had convinced no one. Continue reading “Atal Bihari Vajpayee: Out But Not Down”

सरकार गिरी पर अटलजी ने सौदेबाजी नहीं की

Atal Government fell because it could not muster even one extra vote

NK SINGH

मुझे दूर का दिखाई देता है,

मैं दीवार पर लिखा पढ़ सकता हूं,

मगर हाथ की रेखाएं नहीं पढ़ सकता

-अटल बिहारी वाजपेयी की 1993 में अपने जन्म दिवस पर लिखी कविता।

अगर राजनीति असंभव को संभव कर दिखाने की कला है तो भाजपा ने वस्तुतः ऐसा ही करने का प्रयास किया। एक भी अतिरिक्त सांसद को अपने पक्ष में कर पाने में विफल रहने से जाहिर हो गया कि पार्टी दीवार पर लिखी इबारत नहीं पढ़ पाई। वह यह समझने में  असमर्थ रही कि दूसरी पार्टियों के सांसदों का समर्थन पाने के लिए उसका नया उदारवादी चेहरा किसी को नहीं लुभा पाएगा।

ग्यारहवीं लोकसभा के गणित के मद्देनजर -जिसके अंतर्गत भाजपा और उसके सहयोगिगयों के 194, संयुक्त मोर्चे के 180 तथा कांग्रेस एवं उसके सहयोगियों के 139 सदस्य हैं।-पार्टी ने जो विकल्प चुना वह ऐसा दांव था जिसके गंभीर परिणाम हो सकते थे। फिर, भाजपा ने सरकार बनाने का राष्ट्रपति का न्यौता आखिर क्यों कबूल कर लिया? Continue reading “सरकार गिरी पर अटलजी ने सौदेबाजी नहीं की”

The Rise of OBCs in MP Politics

DB Post 11 Aug 18

NK SINGH

Chief Minister Shivraj Singh Chouhan has invoked his OBC status in the run up to the MP assembly elections. He tells the voters that he is the son of a poor farmer from backward class. And that is why raja-maharajas like Digvijay Singh and Jyotiraditya Scindia and business tycoons like Kamal Nath were trying to oust him from power.

The forthcoming election, he says, is a fight between the poor and the backward on one side and the rich and the feudal on the other.

When Kamal Nath reached Bhopal three months ago to take over as MPCC chief, his combat gear consisted of a voluminous document detailing caste composition of each assembly constituency.

His election strategy also hinges on the OBCs, who constitute more than half of the population in the state. The Congress has realised that its traditional dependence on tribal and dalit votes is no longer a guarantee of smooth sailing at the hustings. Continue reading “The Rise of OBCs in MP Politics”