भारतीय जनता पार्टी: एक के बाद एक ढहते गढ़

A decorated structure in the shape of party symbol ‘lotus’ at BJP’s new headquarters in New Delhi. Credit – PTI photo by Manvender Vashist

गुटबंदी की शिकार पार्टी का  नेतृत्व हालात से निबट पाने में नाकाम

Groupism weakens BJP

NK SINGH

Published in India Today (Hindi) 6-20 November 1996

कांगे्रस की जगह लेने का सपना देखने वाली भारतीय जनता पार्टी अपने गढ़ में ही ध्वस्त होती नजर आ रही है। गुजरात में कांग्रेस की मदद से सरकार बनाकर विद्रोही भाजपा नेता शंकर सिंह वाघेला ने आत्ममुग्ध केंद्रीय नेतृत्व को करारा तमाचा मारा है।

उत्तर प्रदेश चुनाव में निराशा जनक नतीजों के बाद गुटबंदी के दलदल में फंसी पार्टी सरकार बनाने की जोड़-तोड़ में भी नाकामयाब नजर आ रही है। पर इनसे सबक लेने की जगह दिल्ली, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे उसके गढ़ों में भी आपसी कलह नई ऊचाइयां छू रही है। Continue reading “भारतीय जनता पार्टी: एक के बाद एक ढहते गढ़”

Atal Bihari Vajpayee: Out But Not Down

NK SINGH

 

Mujhe door ka dikhayi deta hai,

Mein deewar par likha padh sakta hoon,

Magar haath ki rekhayen nahin padh sakta.

(I can see far ahead,

I can read the writing on the wall,

But I cannot read the lines on my own palm.)

-A poem written by Atal Bihari Vajpayee on his birthday in 1993.

If politics is the art of the possible, what the BJP tried to achieve was virtually the impossible. The party’s failure to win over even one additional MP-its strength on May 28 stood at 194, the same as when its government was sworn in on May 16-demonstrated its inability to read the signals: that the new liberal mask had convinced no one. Continue reading “Atal Bihari Vajpayee: Out But Not Down”

सरकार गिरी पर अटलजी ने सौदेबाजी नहीं की

Atal Government fell because it could not muster even one extra vote

NK SINGH

मुझे दूर का दिखाई देता है,

मैं दीवार पर लिखा पढ़ सकता हूं,

मगर हाथ की रेखाएं नहीं पढ़ सकता

-अटल बिहारी वाजपेयी की 1993 में अपने जन्म दिवस पर लिखी कविता।

अगर राजनीति असंभव को संभव कर दिखाने की कला है तो भाजपा ने वस्तुतः ऐसा ही करने का प्रयास किया। एक भी अतिरिक्त सांसद को अपने पक्ष में कर पाने में विफल रहने से जाहिर हो गया कि पार्टी दीवार पर लिखी इबारत नहीं पढ़ पाई। वह यह समझने में  असमर्थ रही कि दूसरी पार्टियों के सांसदों का समर्थन पाने के लिए उसका नया उदारवादी चेहरा किसी को नहीं लुभा पाएगा।

ग्यारहवीं लोकसभा के गणित के मद्देनजर -जिसके अंतर्गत भाजपा और उसके सहयोगिगयों के 194, संयुक्त मोर्चे के 180 तथा कांग्रेस एवं उसके सहयोगियों के 139 सदस्य हैं।-पार्टी ने जो विकल्प चुना वह ऐसा दांव था जिसके गंभीर परिणाम हो सकते थे। फिर, भाजपा ने सरकार बनाने का राष्ट्रपति का न्यौता आखिर क्यों कबूल कर लिया? Continue reading “सरकार गिरी पर अटलजी ने सौदेबाजी नहीं की”