मध्य प्रदेश विधान सभा चुनाव २०१८ : कैसे कांग्रेस ने सुनहरा मौका खोया

Dainik Bhaskar 13 December 2018

MP assembly election 2018: a tale of missed opportunity

NK SINGH

कांग्रेस अगर २०१३ के मुकाबले अपनी सीटों में लगभग दोगुना इजाफा कर पाई है तो इसपर उसे इठलाने की जरूरत नहीं. भले उसे भाजपा से ५ सीटें ज्यादा हासिल हुई हों, पर वोटिंग परसेंटेज देखें तो कांग्रेस को भाजपा से कम वोट मिले हैं!

सही है, पांच साल पहले उसके और भाजपा के बीच आठ परसेंट वोटों का फासला था और उस बड़े अंतर को पाटने में वह कामयाब रही है. पर बहुमत से दो सीट पीछे रह जाना उसे हमेशा सालता रहेगा.

इस खंडित जनादेश के लिए कांग्रेस खुद जिम्मेदार है. वह अपने पत्ते अच्छी तरह खेलती तो नतीजे अलग हो सकते थे. Continue reading “मध्य प्रदेश विधान सभा चुनाव २०१८ : कैसे कांग्रेस ने सुनहरा मौका खोया”

क से कांग्रेस, कमंडल, कमलनाथ पर कार्यकर्त्ता कहाँ हैं?

Dainik Bhaskar 18 October 2018

Congress under Kamal Nath takes to soft Hinduism in 2018 assembly poll

NK SINGH

कांग्रेस को लगा कि उसके इलेक्शन फार्मूला में सॉफ्ट हिंदुवाद की मात्रा ज्यादा हो गयी है. सो, मध्य प्रदेश में राहुल गाँधी के चौथे चुनावी दौरे में उसे अपनी सेक्युलर विरासत याद आई.

ग्वालियर-चम्बल के दौरे में पीताम्बरा पीठ में पीली धोती पहनकर पूजा करने के बाद कांग्रेस अध्यक्ष ने बाकायदा वजू कर मस्जिद में खुदा को याद किया और गुरूद्वारे जाकर मत्था भी टेक आये.

विन्ध्य और ग्वालियर-चम्बल में राहुल गाँधी की रैलियों में अच्छी खासी भीड़ आई. इसके बावजूद कांग्रेस वह कमंडल छोड़ने को तैयार नहीं, जिसे लेकर वह चुनाव मैदान में उतरी थी. Continue reading “क से कांग्रेस, कमंडल, कमलनाथ पर कार्यकर्त्ता कहाँ हैं?”

सवर्ण वोट मध्य प्रदेश विधान सभा चुनाव में गेम चेंज़र बन सकते हैं

Dainik Bhaskar 9 October 2018

Upper caste votes may prove game changer in Madhya Pradesh

NK SINGH

विधान सभा चुनाव की विधिवत घोषणा भले ही ६ अक्टूबर को हुई हो, पर मध्यप्रदेश में इसकी बिसात जुलाई में ही बिछ चुकी थी, जब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपनी जन आशीर्वाद यात्रा शुरु की.

उस दिन से ही भाजपा और कांग्रेस अखाड़े में ताल ठोंक रहे हैं. इन 12 हफ़्तों में प्रदेश की राजनीति ने दो दिलचस्प करवटें ली हैं.

छह अक्टूबर को जिस दिन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी दोनों मध्यप्रदेश के चुनावी दौरे कर रहे थे, दूर लखनऊ में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव कांग्रेस से नाता तोड़ने की घोषणा कर रहे थे: “कब तक इंतजार करें, एमपी में हम चौथे नंबर की पार्टी हैं.”

एक सप्ताह पहले ही बसपा सुप्रीमो मायावती कांग्रेस को बाय-बाय कर चुकी थीं. पिछले चुनाव के आंकड़े बताते हैं कि बसपा के साथ आने से कांग्रेस को लगभग ४५ सीटों पर फायदा मिल सकता था.

समझा जाता था कि भाजपा को हराने के लिए कांग्रेस दूसरी पार्टियों को साथ लेकर इलेक्शन लड़ेगी ताकि सरकार-विरोधी वोटों का बंटवारा न हो.

राजनीति में दो और दो हमेशा चार नहीं होते, चालीस भी हो सकते हैं. परसेप्शन का अपना महत्व होता है. वह हवा बनाने का काम करता है. Continue reading “सवर्ण वोट मध्य प्रदेश विधान सभा चुनाव में गेम चेंज़र बन सकते हैं”

मध्य प्रदेश विधान सभा चुनाव 2018, ब्रांड शिवराज की कसौटी

Shivraj Singh Chouhan, pic courtesy MP BJP

2018 MP Assembly election a test for Brand Shivraj

NK SINGH

२००३ के विधान सभा चुनाव प्रचार की आखिरी शाम. कार ओरछा के रास्ते गड्ढों में हिचकोले ले रही थी. रात के अँधेरे को चीरती हेडलाइट की रोशनी सड़क के किनारे पड़े गिट्टी के ढेरों पर पड़ी. दिग्विजय सिंह उस तरफ इशारा करते हुए बोले, “चुनाव के बाद सड़क का काम शुरू हो जायेगा.”

सड़क की मरम्मत तो हुई. पर तबतक दिग्विजय सिंह मुख्य मंत्री नहीं थे. उनकी जगह उमा भारती आ गयी थीं.

लालू यादव से प्रभावित दिग्विजय सिंह का खयाल था कि डेवलपमेंट से वोट नहीं मिलते. पर उनकी सोशल इंजीनियरिंग धरी की धरी रह गयी. दलित एजेंडा का पांसा उल्टा पड़ गया. गांवों में सवर्ण और ओबीसी लामबंद हो गए.

पर उस चुनाव में कांग्रेस की करारी हार के पहले दिग्विजय सिंह ने एक और काम किया था —- मध्य प्रदेश को दो हिस्सों में बाँटने का. आनन-फानन में असेंबली से प्रस्ताव पास करा कर सन २००० में छत्तीसगढ़ बना.

नए राज्य ने न केवल मध्य प्रदेश का राजनीतिक भूगोल बदल दिया बल्कि उसके राजनीतिक इतिहास को भी प्रभावित किया.

पहले प्रदेश में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच वोटों का अंतर आम तौर पर एक से तीन प्रतिशत के बीच हुआ करता था. पर छत्तीसगढ़ बनने के बाद वह बढ़कर ८ % से भी ज्यादा हो गया.

२००३ की हार के बाद कांग्रेस लगातार कमजोर होती चली गयी और भाजपा मजबूत. कांग्रेस के वोटों में लगभग ६ % की गिरावट आई.

दूसरी तरफ, भाजपा के विधायकों जीतने का औसत मार्जिन बढ़कर दोगुने से ज्यादा हो गया. भाजपा का जनाधार बढ़ा ही, उसने नए इलाकों पर भी कब्ज़ा किया. अपने पारंपरिक गढ़ मालवा-निमाड़ और मध्य भारत के साथ-साथ वह महाकौशल और बुंदेलखंड में भी मजबूत होकर उभरी.

मध्य प्रदेश में राजनीति की धूरी कांग्रेस से खिसककर भाजपा के पास आ गयी है. पिछले कुछ चुनावों के आंकड़े देखें तो भाजपा को सत्ता से हटाना तभी मुमकिन है अगर उसके खिलाफ कोई कोई हवा चले. Continue reading “मध्य प्रदेश विधान सभा चुनाव 2018, ब्रांड शिवराज की कसौटी”