जब एक जनरल चुनाव लड़ता है

Prajatantra 25 Nov 18

When a General fights an election

NK SINGH

छपे हुए प्रोग्राम के मुताबिक़ सुबह ७ बजकर ५५ मिनट पर चित्तौरगढ़ से भाजपा उम्मीदवार जसवंत सिंह का क़ाफ़िला चुनाव प्रचार के लिए रवाना होनेवाला था।

और ठीक 7.55 बजे अपने सुपरिचित सफारी सूट में उम्मीदवार महोदय उस दिन का चुनाव अभियान शुरू करने के लिए चित्तौर के सरकारी सर्किट हाउस में अपने कमरे से बाहर आए।

बरामदे में उस वक़्त हम केवल पांच लोग  थे। मैं था, एक फोटोग्राफर थे, जसवंत सिंह की गाड़ी के ड्राइवर थेऔर चुनाव इंतज़ाम में लगे भाजपा के दो कार्यकर्ता थे।

सिंह ने पूछा, “और लोग कहां हैं?”

“वे आ रहे हैं,” कार्यकर्ता चिंतित नज़र आ रहे थे।

“लेकिन हमें 7.55 पर निकलना था। कोई बात नहीं, हमें निकलना चाहिए। “उम्मीदवार ने कहा।

जसवंत सिंह ने एक चौथाई सदी से भी पहले फ़ौज की नौकरी  छोड़ दी थी.  लेकिन फ़ौज ने उन्हें कभी नहीं छोड़ा। वह अपनी  राजनीतिक लड़ाइयाँ फ़ौजी तरीक़ों से लड़ते थे। Continue reading “जब एक जनरल चुनाव लड़ता है”

Political battle by military man

First Print 25 Nov 18

 

NK SINGH

The days’s programme for Jaswant Singh, the BJP candidate from Chhittorgarh, Rajasthan, began with a numeric ‘0755 hours’.

At the appointed hour Singh, dressed in trademark safari suit, came out of his room at Chittor’s government circuit house to start the days’s election campaign.

In the veranda only five of us were there. Me, a photographer, a driver and two party workers.

“Where are others”, asked Singh.

“They are on their way,” mumbled the embarrassed workers.

“But we were supposed to start at 7.55. Let us go,” said the candidate.

Jaswant Singh, who would later become India’s Defence, Foreign and Finance Minister, had left Army a quarter century ago. But the Army never left him.  He used to fight his political battles with military precision. Continue reading “Political battle by military man”

Atal Bihari Vajpayee: Out But Not Down

NK SINGH

 

Mujhe door ka dikhayi deta hai,

Mein deewar par likha padh sakta hoon,

Magar haath ki rekhayen nahin padh sakta.

(I can see far ahead,

I can read the writing on the wall,

But I cannot read the lines on my own palm.)

-A poem written by Atal Bihari Vajpayee on his birthday in 1993.

If politics is the art of the possible, what the BJP tried to achieve was virtually the impossible. The party’s failure to win over even one additional MP-its strength on May 28 stood at 194, the same as when its government was sworn in on May 16-demonstrated its inability to read the signals: that the new liberal mask had convinced no one. Continue reading “Atal Bihari Vajpayee: Out But Not Down”

सरकार गिरी पर अटलजी ने सौदेबाजी नहीं की

Atal Government fell because it could not muster even one extra vote

NK SINGH

मुझे दूर का दिखाई देता है,

मैं दीवार पर लिखा पढ़ सकता हूं,

मगर हाथ की रेखाएं नहीं पढ़ सकता

-अटल बिहारी वाजपेयी की 1993 में अपने जन्म दिवस पर लिखी कविता।

अगर राजनीति असंभव को संभव कर दिखाने की कला है तो भाजपा ने वस्तुतः ऐसा ही करने का प्रयास किया। एक भी अतिरिक्त सांसद को अपने पक्ष में कर पाने में विफल रहने से जाहिर हो गया कि पार्टी दीवार पर लिखी इबारत नहीं पढ़ पाई। वह यह समझने में  असमर्थ रही कि दूसरी पार्टियों के सांसदों का समर्थन पाने के लिए उसका नया उदारवादी चेहरा किसी को नहीं लुभा पाएगा।

ग्यारहवीं लोकसभा के गणित के मद्देनजर -जिसके अंतर्गत भाजपा और उसके सहयोगिगयों के 194, संयुक्त मोर्चे के 180 तथा कांग्रेस एवं उसके सहयोगियों के 139 सदस्य हैं।-पार्टी ने जो विकल्प चुना वह ऐसा दांव था जिसके गंभीर परिणाम हो सकते थे। फिर, भाजपा ने सरकार बनाने का राष्ट्रपति का न्यौता आखिर क्यों कबूल कर लिया? Continue reading “सरकार गिरी पर अटलजी ने सौदेबाजी नहीं की”