Comments : Ganga and her people, Part-4

The school set up by Jit Corbett at Mokamah, where Ramdhari Singh Dinkar studied.

चीठिया बाँचे सब कोई 

पाठकों से गप-शप – 4 

बिदेसिया

Pravin Kumar: ये नौका आज भी हमारी स्मृति में पुल की तरह हैं… अद्भुत सर

Arshad Ali Khan : बहुत उम्दा…

मुकेश पाण्डेय चंदन : आज भी पुराने लोगों की स्मृतियों में ये स्टीमर, नाव और पुल है ।
NK Singh : मुकेश पाण्डेय चंदन वास्तव में ये समाज की साझा स्मृतियों का हिस्सा है।
मुकेश पाण्डेय चंदन: आज भी जब मैं अपने नाना जी को आपकी इस तरह की पोस्ट पढ़कर सुनाता हूँ, तो वो पुरानी स्मृतियों में खो जाते है, फिर उन यादों में से कई कहानियां हमे सुनाते है ।

Bidya Shankar Bibhuti: याद आ गयी गंगा. हम सबकी तो दूसरी माँ है वो. उसे सभी रूपों में देखा. मोक्षदायिनी और पापनाशिनी है वो. उसकी याद मध्यप्रदेश में भी आती है.उसके घाट, शमशान के अनगिनत किस्से है, उसकी बाढ़ भी देखी. घड़े बांधकर तैरना, नाव, जहाज –मजे ही मजे
NK Singh: नर्मदा का सौंदर्य तो अदभुत है। प्रभाष जी ने नर्मदा तट पर अंतिम संस्कार के लिए कहा था। उन्हें विदा करने मैं भी गया था। नर्मदा तट का अलौकिक सौंदर्य देखकर मालूम पड़ा कि यह इक्षा उनके मन में क्यों थी! आखिर वे टीएस इलियट के प्रेमी थे।

Dr-Deepak Rai: Sunder jankari sir

Zafar Aalam Hashmi: जहाज मे यात्रा तो मेने नहीं की लेकिन नाव पर जरूर बैठा था। पढते पढते नाव पर बैठने का अहसास दिमाग पर तारी हो रहा था फिर रेणू जी के पंचलेट कहानी बरबस याद आ गई एक पेट्रोमेक्स पुराने सामान मे मिला था जो सहेज कर रखा है जला नही सका हूं. अगले लेख का इंतजार हैं

Satyendra Tiwari: गंगा की गहराई जहाजों के लिए उपयुक्त है । क्या अभी भी ?
NK Singh: तभी तो सरकार कोशिश कर रही है। फरक्का बांध बनने के बाद इसमें थोड़ी दिक्कत पैदा हुई है।

Vijay Dutt Shridhar: यह पुस्तक रूप में भी आना चाहिए ।

Ayodhya Nath Mishra: बच्चा बाबू के जहाज… एक संघर्ष शील स्मृति.

Anil Dixit: गज़ब है ये लेखन। सलाम सर।

Sachin Kumar Jain: ऐसा लगता है कि हम खुद यह देख रहे हैं, चल रहे हैं और गुजर रहे हैं।

Sharad Dwivedi: अद्भुत ! सर ऐसे विषयों पर पूरी श्रृंखला अपेक्षित है !
NK Singh: धन्यवाद। I have got tired of writing on politics, although as John Masters says in Bhowani Junction, no aspect of life is free from politics.
Sachin Kumar Jain: मुझे भी यही अहसास होता है सर।
Zamiruddin: EM Foster the English novelist said the same thing. HE SAID: INDIANS HAVE THE BAD HABIT OF IMPORTING POLITICS IN EVERY THING.

Raza Mawal: वाह

Shailendra Singh Bhadauria: Bahut khoob

Chinmay Mishra: करीब 50 साल पुरानी बातें याद हो आईं।
अपने ममाने जाने के लिए पिता व मां के साथ दिल्ली से ट्रेन और बाद में महेंद्रू घाट से पलहेजा घाट का सफर। ट्रेन से उतरना और नदी पार करने के लिए स्टीमर में बैठना और घाट से लगे स्टेशन से पुनः ट्रेन का सफर शुरू करना। स्मृतियों की मिठास का स्वाद पुनः चखवाने और उस कुतूहल भरे रोमांच को दोबारा अनुभव कराने के लिए आपका हमेशा ऋणी रहूंगा।
आपको प्रणाम।

Sanjay Kumar Jha: Thanks Singh Sahab. You have taken me down memory lane sometimes which I had almost forgotten. I still remember when I got admitted to Patna Science college, I used to take a train from Darbhanga in the late evening, reach Pahlejaghat in the morning if lucky but noon quite often, wait for Bachha singh steamer and finally reach Mahendru in the evening. Travelling to Patna was more than 24 hours affair. How things have changed. Now there is direct flight to Darbhanga. But steamer journey used to be most exciting eating sandwiches and boiled eggs sitting on deck and watching majestic Ganga .It was so romantic.
Getting nostalgic but Thanks again.

GL Sonane: शानदार।

Santosh Manav: अंततः बच्चा सिंह मिल गए. दोनों स्टीमर मालिक. उस समय दोनों बड़े लोग कहे जाते थे. गंगा के बहाने इनका भूत, वर्तमान जानने की इच्छा है.

Vijaya Kumar Tewari: बचपन की भूली बिसरी यादे यही एक दिन छेत्र का जन इतिहास बन जाती है। इतिहास बना कर बताया नही जाता ,वह तो जिया जाता है ।जैसे आप का आलेख

Saurav Rajput: बहुत सारे लोगो को या बच्चो को इस बारे मे जानकारी नही होगी । आपको कोटि कोटि प्रणाम बहुत सारी जानकारी देने के लिऐ ।

Shashi Kumar Keswani: गजब

Srijnesh Silakari: मन को शीतल करने वाला स्मृति लेख। विचारोत्तेजक तो आम हो गया है।

Roshan Kohli: पढ़ कर बहुत मज़ा आया.Taken me back to 50/60’a of Easter Up & North Bihar & right upto Nepal Border through dense forest where used to go around in Jeep during Winter Holidays.. Best Wishes to you & family

Siddhartha Arya: नादियों की कोख से सभ्यतायें जन्म लेती थी और पनपती थी. आज के दौर में बेशहूर शहर पनपते हैं सड़कों के आजाने से . आपकी गंगा श्रन्खला बहुत मन भायी .

Bhagwan Prasad Sinha: यह इतिहास का महत्वपूर्ण पन्ना है। बधाई हो

Mohan Manglam: अद्भुत अद्वितीय आलेख

Dilip Jha: Immense pleasure sir. Unique . congratulations.

Dhirendra Saksena: I remember Bacha Baboo, this was the time when steamer business was flourishing, my college days at Patna University.
NK Singh: The steamers were the only means of transport if you wanted to cross over to the other side. A train would entail a day long journey.
Dhirendra Saksena: You are right- Gandhi setup bridge wasn’t built then.

Mithilesh Kumar: अब तक बस इसके बारे में सुना था…आज पढ़कर अच्छा लगा

Rajkumar Jain: बहुत शानदार और बेहद दिलचस्प यात्रा

Ganga Prasad: पुरानी यादें थामती हैं
NK Singh: Indeed

Dr. Rakesh Pathak: बहुत ही बढ़िया सीरीज़ लिख रहे हैं सर। धरती की सोंधी गंध में रची बसी। बधाई

Kumar Alok Pratap: Dhanyawad is gudgudati shrinkhala ke liye

Narendra Kumar Tripathi: Good one

Yogiraj Yogiraj Yogesh: इस पूरी श्रंखला में यदि गंगा घाट के वर्तमान फोटो होते तो और बेहतर हाेता। खासतौर पर मुंगेर के भव्य किला और घाट का जो चित्र आपने खींचा उसे देखने की इच्छा बलवती हो उठी। शानदार, अद्भुत और रोमांचक लेखन के लिए बहुत-बहुत बधाई सर।
NK Singh: Yogiraj Yogiraj Yogesh I shall be putting these photo and paintings along with the text of the article on my website very soon.

Aleem Uddin: VERY INTERESTING

Sudhir Sudhakar: रोचक..आपकी इस गंगा..शृंखला ने मेरी स्मृति की बिखरी कड़ियां जोड़ दी है…,मुझे याद आ रहा है वर्ष 1972 का वह दिन जब मैं अपने बाबा के साथ पहली बार पटना जा रहा था। पहलेजा घाट से पहली बार जहाज में सवार होने.. गंगा की छाती चीरते, चिंघारते जाते जहाज की वह रोमांचपूर्ण यात्रा…सारे दृश्य एक एक कर लहरा रहे हैं जेहन में ..गंगा की लहरों पर सवार होकर…बहुत ही शानदार तरीके से लिख रहे हैं आप सर…सादर बधाई..

Pankaj Sharma: मुझे बच्चा बाबू से कई बार मिलने का मौक़ा मिला। वे वैसे तो ख़ामोशी ओढ़े रहते थे। लेकिन 1981-82 में दिल्ली में जब-जब उन से मुलाकात हुई, मुझ से बहुत बातें करते थे। शिवकुमार सिंह खंडवा से लोकसभा में चुन कर आए थे। बच्चा बाबू उनके रिश्तेदार बने-ही-बने थे। जब दिल्ली आते तो षिवकुमार जी के यहां उन के साथ लंबी बातचीत होती थी। शिवकुमार जी लड़की वाले का अनुशासित-मर्यादित नाता निभाते थे, सो, बेतकल्लुफ़ चर्चा बच्चा बाबू मुझ से करते रहते थे। उनकी असली धमक का चूंकि मुझे कोई अंदाज़ नहीं था तो मैं बेहिचक बात करता था और यह बेलौसी उन्हें भा गई थी। उनके बारे में तमाम तरह की कथाएं प्रचलित थीं, जिनके बारे में मैं उन्हें कुरेदता रहता था और वे ‘छोटन को उत्पात’ मुद्रा में टालूमटोलू जवाब देते रहते थे। आपकी यह श्रंखला पछुआ की मानिंद है। जारी रखिए। किताब आनी चाहिए।
NK Singh: I still remember that the Barat from Bihar had come to Khandwa by a special train. Probably 1976 or 1977.

Shrikant Sharma: कहानी में और भी बहुत कुछ और साथ ही अभी तो बहुत ही रोचक बातें सामने आना बाकी है। बहुत ही दमदार लेखन Sir Pranam karta hu Ji

Kunal Pratap Singh: बहुत सुंदर संस्मरण।

Gyanesh Upadhyay: वाह वाह

Kunal Pratap Singh: बहुत सुंदर संस्मरण।

Sanjay Pandey: शानदार सर

Nraghuraman Aiyer: This reminds of my childhood where we used river Cauvery to cross umayalpuram to papanasam a village to district headquarter three times in one trip since the Perennial river was taking a U turn at several junctions before heading to Kumbakonam the pilgrimage town on Tamil Nadu. At every crossing the boatman was different and everyone had a different style of carrying people across. Someday I will share those 55-year-old story with you boss.

Subash Arora: बहुत खूब

डा.अजय खेमरिया: बहुत ही शानदार सर

Rajkumar Jain: अद्भुत, बहुत दिलचस्प, रस के सागर में डुबकी मारने जैसा अनुभव

Sanjeev Tulsyan: aapka lekhan report nahi literature hai

Hemant Sharma: बेहद दिलचस्प अन्दाज़

पुरानी पाती : चिठिया बाँचे सब कोई – 3

आलेख – स्मृति के पुल: गंगा बहती हो क्यों. . . पार्ट 1

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