Comments : Ganga and her people, Part-1

Luxury boats at Varanasi, 1868, Credit – People of India

चीठिया बाँचे सब कोई 

पाठकों से गप-शप – 1   

स्मृति के पुल : गंगा बहती हो क्यों. . .

Praveen Kumar Khariwal: वाह

Vijaya Kumar Tewari: अति सुंदर

Ramesh Mishra Chanchal: लेखनी का पैनापन भी है sir

Vinod Purohit: शानदार

डा.अजय खेमरिया: बढ़िया है आपको पढ़ने का अवसर मिलेगा

Kishore Bhuradia: अच्छा है। शीर्षक बहुत अच्छा दिया है बंदिनी फिल्म की याद आ गई।
NK Singh: आगे उसका भी जिक्र है।]

Arif Mirza: वाह क्या मंज़र खींचा है आपने…लगा जैसे गंगा घाट पर जहाज़ छूटने ही वाला है। आपकीं लेखनी को मेरा सलाम।
Dinesh Binole: बस पढ़ते चले जाओ क्या खूब नजारा है… अगली कड़ी का इंतजार रहेगा

Mahendra Kumar Kushwaha: Great

Sanjeev Acharya: आपकी अनुभवी लेखनी पढ़ने को मिलेगी
NK Singh: मैं तो हुज़ूर आपकी लेखनी का कायल हूँ। क्या बेहतरीन राजनीतिक किस्से आपने सुनाए हैं!
Sanjeev Acharya: आपका अनुज हू

Zafar Aalam Hashmi: यह सब पढ़ने मे मजा आया. बहुत चाव से बयान किया जैसे स्टीमर छूटने ही वाला हैं इस ठंड मे गरम चाय की प्याली कें साथ पूरा लेखन गजब का लगा

Mohan Manglam: क्या संयोग है कि अभी-अभी अमर उजाला का ई-पेपर पढ़ने के बाद फेसबुक स्क्रॉल कर रहा था कि आपकी वॉल पर यह आलेख दिख गया। परम आनन्द की अनुभूति। पटना में स्टीमर से गंगा पार करने का मुझे मौका तो नहीं मिला, क्योंकि तब तक महात्मा गांधी सेतु बन चुका था, मगर आपने शब्दों के माध्यम से जो यात्रा करायी, सारा मलाल जाता रहा। इस सफर के हमसफर का आपने जो शब्दचित्र उकेरा है, उसका जवाब नहीं।

Laxmi Narayan Tiwari: sir nice to read you article

Raza Mawal: वाह शानदार मंजर
NK Singh:  हमें तो घंटों लिखना पड़ता है और आप एक क्लिक के साथ वो चमत्कार पैदा कर देते हैं!

Prashant Soni: बेहतरीन सर

Madan Kalal: बहुत शानदार सर

Rambaran Sharma: बहुत सुंदर

Gurudas Upadhaya: जो रोमांच गंगा के प्रवाह को देखने, महसूस करने में होता है वही आपके आलेख को पढ़ कर हुआ।

Paresh Kaushik: बहुत शानदार सर… आपके लेखन से बहुत कुछ सीखने को मिलता है…!!!
Bhupendra Gupta Agam: अति सुंदर गंगा घाट ही नहीं कितनी नदियों का दृष्य स्मरण हो गया
NK Singh: Bhupendra Gupta Agam सारी नदी घाटियों की सभ्यता लगभग एक जैसी है।

Sushil Trivedi: Very absorbing narrative.

Yogendra Chandel: Beautifully written
NK Singh: Yogendra Chandel Thanks.

Sachin Kumar Jain: बहुत सुंदर। सहज प्रवाह के साथ।
NK Singh: Thanks, these words mean a lot to me because I am an admirer of your writings.
Sachin Kumar Jain: ब हुत बहुत शुक्रिया सर। इसमें आपका ही सबसे महत्वपूर्ण योगदान है।

Bhan Singh: Bahut din bad kuch accha aur rochak padhane ko mila hai.

Dilip Singh Sikarwar: बहुत दिन बाद भूख मिटी सर जी

Gopal Agrawal: बहुत सुंदर

Ganga Prasad: बहुत ही बढ़िया
NK Singh: Ganga Prasad अगर आप को अच्छा लगा तो मैं धन्य हो गया! अरसे से मैं आपका मुरीद हूँ।
Vijay Dutt Shridhar: बहुत सुंदर लेख । भाषा और भाव दोनों दृष्टि से पठनीय और संग़हणीय । लेखक को बधाई । संपादक को धन्यवाद ।
NK Singh: आपका यह कहना मेरे लिए काफी मायने रखता है। और संपादक जी तक मैं यह संदेश पहुँच दूंगा।
Narendra Dubey: सर बहुत सुन्दर संस्मरण आलेख । आनंद आया ।हर हफ्ते पढ़ने मिलेगा ।जानकर अच्छा लगा ।

Khandelwal Braj: Yes, याद आ गया स्टीमर से वो पहली यात्रा, दरभंगा के लिए, भेड़, बकरी, खोमचे वाले, पूरा Noah’s Ark जैसे, सवा घंटे में नदी पार हुई, गंगा का विराट स्वरूप अद्भुत, आपने बहुत बढ़िया लिखा, धन्यवाद NK. हां, अमर उजाला में निखार आया है, ले आउट भी बेहतर हुआ है
NK Singh: How are you Braj? Thanks for appreciation. By the way, I am digitising my articles published in Point of View and putting it on my website. Hope you have noticed that.
Khandelwal Braj: sorry no, pl give website name. I would love to read them. I am now based in agra
NK Singh: www.nksingh.in. NK’S POST – Public & secret histories of our times

Naresh Kaushik: Good to know NK! Very challenging time for the newspaper industry- more so in India.
NK Singh: Naresh Kaushik Thanks
Naresh Kaushik: But it’s always a pleasure to read your articles.

Jayesh Kumar Verma: हम गंगा जी से दूर रहे, पर माँ नर्मदे के साथ रहे, आपकी लेखनी का वाङ्गमय प्रवाह नदियों के उन तटों पे होने वाले परिदृश्यों का जीवंत एहसास कराता है, बहुत सुंदर,भाई जी..
NK Singh: मैंने एक मित्र को पहले भी लिखा था कि सारी नदी घाटियों की सभ्यताएं लगभग एक जैसी हैं।

Indrajit Prasad Singh: जोरदार लेख । भाई आपने पुरानी यादें ताजा कर दीं । महेन्द्रू घाट से सरकारी व बांस घाट से बच्चा बाबू का स्टीमर पहलेजाघाट के लिए खुलती थी । दर्जनों बार अपने गांव जाने पटना आने के लिए स्टीमर की यात्रा की है । जारी रखें ।
Govind Badone: बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति

Ramendra Kumar Sinha: बेहतरीन सर, बहुत दिलचस्प

Raakesh Pathak: शब्द और उससे खींचा माज़ी का चित्र। ठीहे जो थे कल, वो आज के प्रवाह में बहुत बदल चुके हैं। वर्तमान गतिमान है इसकी गति सापेक्षता में ही दीख पाती है। गंगा के किनारे के हजारों ठीहे ऐसे ही बदलते गए हैं सर। आपका लेख उन बुझ चुके ठीहों को फिर जिंदा करता है। स्मृतियां चढ़ती हैं उतरती हैं, गंगा की लहरों के समान। और जीवन आज की भागीरथी की तरह शिथिल हुआ जाता है। शानदार लेख।
NK Singh: हम अपनी स्मृतियों से चाहकर भी अलग नहीं हो सकते। उनमें एक जादुई एहसास है। Best example would be my favourite author — Gabriel Garcia Marquez.

Bhopendra Sharma: बेहतरीन! रोचक स्मृति।

Satyendra Tiwari: Welcome back. Very nice article

Obaidullah Mubarak: बौद्धिक और सांस्कृतिक स्वाद मिला। धन्यवाद सर, अपको सलाम है।

Prabhat Kumar: रोचक व ज्ञानवर्धक

Bharat Saxena: यह अच्छी शुरुआत है, झरने की तरह,कल- कल करता चंचल प्रवाह,। साधुवाद।।

Shiv Narayan Dwivedi: भारत में रत्न भरे पड़े है ,यत्र तत्र सर्वत्र ,आश्चर्य जनक है ,यह प्रकाशित नहीं ,आलोकित नहीं ,जहां है वहीं पड़े हुए है ,जब कि आज की आवश्यकता है इन्हे खोजने तथा धो पोछ कर प्रकाशित करने की ,प्रश्न है करेगा कौन और क्यो ? आलेख पढ़ कर मुंशी प्रेमचन्द की याद आना स्वाभाविक है । यथार्थ को धरातल पर उतारने तथा उसे शद्बो में बाधने की शैली मन को भागई । लेखकीय श्रम को प्रणाम

NK Singh: तारीफ का शुक्रिया। पर आप जिस तरफ देख रहे है, मैं उन महान लोगों की पैरों की धूल के एक कण के बराबर भी कभी अपने जीवन में बन सका तो अपने आप को धन्य समझूँगा।

Sameer Fakira: बेहद खूबसूरत मंज़र आंखों में तैर गया उस वक्त का सब वक्त. बहुत ही खूबसूरत अंदाज़. आपको सादर सलाम. अब आपको पढ़ने मिलेगा बस यही काफी है

Bidya Shankar Bibhuti: लाजबाब, ननिहाल जाता था भग्गू सिंह के स्टीमर से, लेख जाने के धक्का देने जैसा है लेकिन अब तो पुल बन गया, वो उत्साह जाता रहा. शानदार सर
Surendra Singh: Bidya Shankar Bibhuti ‘भग्गु सिंह का जहाज’ कौन भूल सकता है।
NK Singh: Bidya Shankar Bibhuti आगे लेख में भग्गू सिंह भी आएंगे और बच्चा बाबू भी।

Raj Kumar Anjum: बौद्धिक और सामयिक आलेख। यह आप ही का हिस्सा हो सकता था।

Manish Dixit: बेहतरीन सर

Ajeet Singh: बहुत बढ़िया। आपके संस्मरणात्मक आलेख को पढ़ते हुए गाँव-जवार की याद हो आयी।
NK Singh: Ajeet Singh My friend Raajkumar believed that nostalgia and references are the two most powerful weapons for writers.

Avinash Kudesia: •••••• गंगा के घाट पर आपने बहुत ही अच्छी तरीके से इसका विश्लेषण किया जिसमें लघु व्यापार का भी जिक्र किया उस समय गंगा की आस्था के साथ-साथ लोगों के पेट का भी ध्यान दिया जाता था. आप बधाई के पात्र हैं

Virender Singh: बहुत सुंदर व सजीव चित्रण गंगा के घाट का।

Jyotsna Pant Shrivastava: बेहद रोचक और जानकारी से भरपूर। धन्यवाद

Surendra Singh: बचपन की याद दिलाने वाला आलेख। गंगौर से खगड़िया – खगड़िया से साहेबपुर कमाल और वहाँ से ‘घटही गाड़ी’ से मुंगेर घाट तक की यात्रा जीवन्त हो उठी।

Kuldeep Singh: Great Sir

KS Tomar: EXCELLENT AND IMBEDDED IN POETIC STYLE

Vinod Sharma: Bahut khoob…

Shyam Vetal: बहुत खूब … अति सुंदर. बिहार की यादें ताज़ा हो गईं ..

Arshad Ali Khan: वाह! बहुत लाजवाब…
Ashok Mathur: Wah intezar raha karega aapki post ka ..

Shrikant Sharma: Great of you Sir

Ramesh Kumar Ripu: भाषा का संस्कार लेख में दिखना बड़ी बात है।

Deepak Upadhyaya: लाजबाव सर। भागलपुर को भी आपने याद किया है। अब घाट बीरान है स्टीमर तो पता नहीं। कहलगांव से छोटे फेरी वाला स्टीमर चलता है।
NK Singh: सरकारी या प्राइवेट?
Deepak Upadhyaya: ठेके पर। प्राइवेट।

Arun Kumar Mishra: सजीव चित्रण।

D K Sharma: शानदार sir

Dinesh Joshi: शानदार विश्लेषण

Shivkumar Vivek: आपको पढ़कर अच्छा लगता है सर। वाकई की का कंटेंट बहुआयामी है।
NK Singh: Thanks a lot. Such appreciation from a colleague means a lot to me, really!

Ram Singh Chouhan: आदरणीय आपकों इंडिया टुडे में लम्बे समय तक लगातार पढ़ने का अवसर मिला इंडिया टुडे से पृथक होने के बाद आपकों नियमित रूप से पढ़ने का अवसर र्दूलभ हो गया है,अमर उजाला के पन्नों पर अब कुछ समय तक आपको पढ़ने का पुनः अवसर बना, यदि संभव हो तो कृप्या बताइए कि नियमित रूप से आपके आलेख कहां और कैसे पढ़ने का अवसर प्राप्त हो सकता है ।
NK Singh: Whenever I write something, I try to give a link on the Facebook and Twitter.

Shubhash Jha: बेहतरतम
Narendra Kumar Tripathi: Good description of Bihar and thrill of crossing Ganga.
NK Singh: Narendra Kumar Tripathi You have served in North-East during your distinguished career, you must have seen those ferries that remind us of Mark Twain’s Mississippi.
Narendra Kumar Tripathi: Yes once I crossed mighty river Brahmaputra at Nimati Ghat in a big boat which also carried my jeep. While going to Gauhati in a slow moving Meter gauge train I used to pass slowly through North Bihar in those days and I observed the landscape and villages with keen eyes.

डॉ. अतुल मोहन सिंह: बहुत सुंदर आलेख सर सादर प्रणाम

Deepu Naseer: उम्दा लिखा है। अच्छा यह भी रहा कि आपने अपने लेख के लिए ” जागरण ” को नहीं चुना। अगली किश्तों का इंतज़ार रहेगा।
NK Singh: अमर उजाला को इसलिए भेजा क्योंकि मुझे असल में इस लेख के लिए एक ऐसा संपादक चाहिए था, जिसके पास कोयले में से हीरा निकालने की कला हो। और जैसा कि मैंने लिखा है स्वभाव से संकोची और लो-प्रोफाइल यशवंत व्यास ऐसे बिरले संपादकों में से हैं।
Ratnakar Tripathi: सर। बहुत दिन बाद एक बार फिर बहुत सीखने लायक आपका लेखन।

Madhukar Budhe: बधाई आपको , लंबे अवकाश के बाद, नईदुनिया से अमर उजाला में गंगा घाटों पर पठनीय आलेख के माध्यम से मिलने का अवसर आपने हमें दिया।वो भूली-बिसरी निले शर्ट-व्हाईट पेंट की पोशाख में स्व रज्जू बाबू के साथ ग्रंथालय के चेंबर में काम करते क्षणों की यादें फिर ताज़ा हो गई।ओम साईं राम।
NK Singh:  शुक्रिया। अद्भुत लाइब्रेरी थी। और मैं तो उन दिनों को कभी भूल नहीं पाऊँगा। मैं बड़ा भाग्यशाली था कि रज्जु बाबू जैसे महान संपादक के कदमों में बैठकर मुझे सीखने का मौका मिला। उनके जैसे गुण-ग्राहक संपादक दुर्लभ हैं।

ललित श्रीवास्तव: विख्यात और कुख्यात नदियां ! भाई वाह !! समां बन गया !!!

Sudhir Sudhakar: बेहतरीन संस्मरण आलेख…संपादक को साधुवाद…

Prakash Bhandari: Wah

Mithilesh Kumar Singh: बहुत बढ़िया। भीग गये हम।
NK Singh: जब भी सुबह रोने का मन करता है, रेणु जी कि किताबें निकाल लेता हूँ। उनकी ऐसी कई कहानियों से आप अच्छी तरह परिचित हैं। सबकी सब आपको नोस्टेलजिया की ओर ले जाती हैं। आप जैसा व्यक्ति शायद इसका मर्म समझ पाएगा।
Mithilesh Kumar Singh: प्रेमचंद के बाद मेरे सर्वाधिक प्रिय लेखक हैं रेणु। कई मामलों में प्रेमचंद से भी आगे के कथा लेखक। प्रेमचंद के यहां संगीत नहीं है, पगध्वनियां हैं, मुफलिसी है, बेचैनी है और पार पाने की चिंताएं हैं। रेणु के यहां इन सबके बीच अहर्निश बजता संगीत भी है। उनके यहां दारुण्य तक का संगीत है जो हिंदी में और कहीं नहीं मिलता। प्रेमचंद बुनियादी तौर पर गंवई जीवन के लेखक हैं। रेणु गांव के भीतर कुनमुना रहे कस्बे की शिनाख्त के लेखक हैं और उनका इस रूप में मूल्यांकन अभी होना है।

Vijay Shukla: इससे हिन्दी पत्रकारिता मजबूत होगी। यह शुभ संकेत है।

DrPramod Shanker Soni: Brilliant sir

DrDevendra Sharma: जीवंत चित्रण।ठीक पापनाशिनी गंगा की भांति. प्रवाह आपकी अज्ञाननाशिनी लेखनी का।

Siddhartha Arya: रोचक . पठनीय. सुना है बानारस से कलकत्ता तक ज़लमार्ग हुआ करता था. सभी किश्त पोस्ट करते रहियेगा .शुभकामनायें .

NK Singh: सही है, लास्ट मुगल में इसका जिक्र है। 1857 में अंग्रेज स्टीमर से ही बहादुरशाह जफर को इलाहाबाद से कलकत्ता ले गए और बाद में रंगून।

Mohd Yunus: हर किस्त का आतुरता से इंतजार रहेगा।

Krishnaballabh Prasadsingh: Thanks for taking to good old days of B N College Hostel
NK Singh: Those were the days! Golden nostalgia.

Priyadarshan Sharma: गंगा पर 1959 में बिहार का पहला पुल मोकामा में बनने के पहले मोकामा की पहचान मोकामा घाट से थी। मशहूर शिकारी जिम कार्बेट किसी जमाने में मोकामा घाट में स्टीमरों के रखवारे थे।
NK Singh: Thanks for this information. I did not know that Jim Corbett lived in Mokamah.
Priyadarshan Sharma: उन्होंने अपनी किताब ‘My India’ में मोकामा में बिताए 20 बरस का विस्तार से वर्णन किया है

Rahul Ray Chatterjee: Congratulations sir

Bikash K Sharma: मजा आ गायिल। चालू रखीं।

Shiv Harsh Suhalka: Nice Article….

Kunal Pratap Singh: बहुत खूब।

KaushalKishore Trivedi: पढ़ने के बाद उस दौर की कल्पना ही मन को रोमांच से भर दे रही है. वाकई बहुत अच्छा.

Abhi Manoj: अविस्मरणीय लेखन… बहुत दिनों बाद रिपोतार्ज पढ़ने को मिला… शीर्षक ने ही गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो जैसे शब्दों की याद ताजा करा दी… पता नहीं कहां गुम हो गए घर-आंगन के ऐसे शब्द… अब सुनने को भी नहीं मिलते …
NK Singh: रेणु को पढिए, और बार बार पढिए। आपको लगेगा वे अलौली में आपके गाँव की गाछी में बैठकर आपके गाँव के बारे में ही लिख रहे थे।

Radhey Shyam Aggarwal: Bahut khub new generaition ko milage jankare

Rajendra Kothari: बधाई. हर किस्त का आतुरता से इंतजार रहेगा।

Ramprakash Tripathi: बधाई
NK Singh: आपको वाकई अच्छा लगा, या ऐसा लगा कि पचास साल पहले त्रिलोचन जी ने आपके सामने मुझे जो “अच्छी हिन्दी” नामक पुस्तक भेंट की थी वह आखिर काम आ गई!

Suresh Mahapatra: आपकी इस शृंखला से नई पीढ़ी को सचमुच बहुत कुछ मिलने वाला है।
“ गंगा बहती हो क्यों”इस शृंखला की पहली पंक्ति मार्मिक है… तब गंगा में लाशें नहीं तैरा करती थीं।
हर कड़ी का इंतज़ार रहेगा सर…

Prashant Dubey: सर, हमने गंगा को न तो इतने करीब से देखा है, न ही जिया है। हम नर्मदा पट्टी के बाशिंदे हैं। पर इस तरह की रिपोर्ट को पढ़कर हम नदियों के महत्तम और उसके पास बसी एक जीवंत संस्कृति की झलक पाते हैं। आप बात गंगा की कर रहे हैं और हम उसे नर्मदा से जोड़ कर देख पा रहे हैं। यही सौंदर्य है आपकी लेखनी का। बाकी सर, आपको जितना आंग्ल भाषा में पढ़ना सुखद है, उतना ही हिंदी में। लिखते रहियेगा सर, बहुत कुछ सीखना है अभी। साधुवाद।
NK Singh: आप सही कहते हैं। मुझे भी लगता है कि हिंदुस्तान में सारी नदियों के आस पास जो संस्कृति विकसित हुई, उनमें काफी सम्यताएं हैं। आपको लेख अच्छा लगा, जानकर मुझे बड़ा अच्छा लगा।

Rajkumar Jain: बेहतरीन

Rmp Singh: Congratulations .

Lalit Upmanyu: सर, प्रणाम। हम घर बैठे गंगा, बिहार देख लिए, घूम लिए.. एकदम जीवंत चित्रण.. हमेशा की तरह आपकी लेखनी का कमाल l अगली किस्त का इंतज़ार l

Rmp Singh: “ गूँज रहे तेरे इस तट पर , गंगे गौतम के उपदेश । ध्वनित हो रहे इन लहरों में देवि ! अहिंसा के संदेश ।। “दिनकर.
NK Singh: आगे  भी एक जगह मैंने दिनकर जी को कोट किया है। याद करें, कहाँ वे बिहार की नदियों का जिक्र करते हैं?

Bachchan Bihari: स्टीमर, पहलेजाघाट, लिट्टी, चिनियाबादाम, पटना….सब याद आ गया…
NK Singh: यही तो मजा है। हम लोगों को यही सब याद दिलाना चाहते थे। और जिन्होंने ये सब नहीं देखा है, उन्हे बताना चाहते थे कि इलाहाबाद से कलकत्ता जहाज पहले भी चलता था।

Rajendra Kasliwal: Bahut khoob…

Neelam Sharma: Bahut samay baad aapka article padha.. behtreen sir..

Om Prakash Goel: Happy that you have started writing again. keep it up. Very interesting.
NK Singh: U r the inspiration, boss.

Vishal Chouhan: Incredible lines

Anand Kumar Sharma: What a poetic writing , superb

Shashi Kumar Keswani: शानदार

Anil Singh Chauhan: सर प्रणाम, बहुत ही सटीक लिखा है…

Prakash Trivedi: सर बहुत ही रोचक है,

Yogiraj Yogiraj Yogesh: अब अपन तो भोपाल के बड़े तालाब के किनारे वाले हैं। इसलिए बचपन में धुआं छोड़ते और भापू बजाते स्टीमर की सवारी का सुख तो नहीं मिला लेकिन आपके आलेख ने जरूर स्टीमर पर बैठकर गंगा की लहरों का रोमांचकारी अनुभव करा दिया। बहुत बढ़िया आलेख सर। अब अगली किस्तों का इंतजार रहेगा।

Vinod Mishra: बहुत बढिया सर ।

Raghu Aditya: Pranam sir, lajwab content

Hari Agrahari: काफी दिनों बाद आपकी लेखनी का स्वाद मिला है सर। शुभकानाएं।

Krishan Kant Upadhyay: बहुत ही शानदार है ।

Pankaj Shrivastava: शानदार सर

Swaraj Puri: awe inspiring …as always NK

Abhijeet Kumar Singh: Lovely write up… Complete picturisation…

Arun Trivedi: शानदार आलेख सर

Neelmegh Chaturvedi: Excellent article on Jeevan dayinee man Ganga.

Asha Arpit: Badia sir

Pramod Kumar Singh: Lovely wtite up

Santosh Manav: स्टीमर पर चढ़ा हूं. पहलेजा घाट, पास में था सरकारी बस स्टैंड
NK Singh: ये हमारी-आपकी स्मृतियों के साझा सांस्कृतिक यादें है। मेरा हॉस्टल एक सड़क के पार था। सो, कभी बस की जरूरत ही नहीं पड़ी।
Ajay Dixit: शानदार आलेख सर

Kumar Ranjan: बहुत सुंदर, जीवंत आलेख। स्टीमर को लेकर पुरानी यादें ताजा हो गयीं। महेन्द्रूघाट से पहलेजाघाट तक चलने वाले बच्चा बाबू के स्टीमर से मैने भी यात्रा की है मुजफ्फरपुर आने जाने के क्रम में। अब तो यह सब यादों में है।
NK Singh: आगे बच्चा बाबू भी आएंगे और भग्गू सिंह भी! इस लेख में मेरे फ़ैक्ट चेकर सुरेन्द्र किशोर जी थे, जिन्हे मैं तब से जानता हूँ जब वे सुरेन्द्र अकेला हुआ करते थे।

Om Prakash Singh: अद्भुत।

Parivesh Mishra: Very interesting. Waiting for the coming Sundays.
NK Singh: Shedding my modesty aside, I can tell you that u are not going to be disappointed.

Prahlad Nayak: Bahut umda sir

Saket Dubey: बहुत दिनों बाद आपको पढ़ा। बहुत अच्छा लेख है। बधाई। निरंतर पढ़ने का मौका पहले की तरह मिलता रहेगा।

Vps Bhadoriya: सर जबरदस्त वर्णन किया है

Swayam Prakash: अहा, मज़ा आ गया। बचपन की स्मृतियां जीवंत हो गईं। घर में भगिनी की शादी है। पर माँ, दीदी को पढ़ कर सुनाया। आँखें हम तीनों की गीली हो गईं। अतीत में चला गया। बाल मन से सोचने लगा। पहलेजा,महेंद्रू, एलसीटी, बांस घाट पर स्टीमर से आने जाने की बातें। हम पहलेजाघाट वाले हैं। बहुत दिनों बाद अवर्णनीय आनंद। प्रार्थना है निरंतरता बनाये रखें। सृजन जारी रहे। यह पीढी अनजान है। बात पुरानी है। 20 साल बाद। जिस भगिनी की शादी है तब उसे उसके घर खरिका से गंगा किनारे ले गया था। यह बताने कि दीदी यानी उसकी माँ , हम तुम्हारे जैसे बच्चे थे। श्रद्धेय जेपी व प्रभावतीजी ने स्कूल खोला था। अमराईयों के बीच। ऐतिहासिक बिहार विद्यापीठ व सदाक़त आश्रम के पीछे। जिन जेपी व जवाहरलाल नेहरू के बीच कैसे आत्मीय संबंध थे, सीखने लायक है। राजनीति अपनी जगह। पर समाज सेवा साथ साथ। काश, हम सब भी सीखते- व्यक्ति से बड़ा है सकल समाज, राष्ट्र। स्कूल का नाम था- कमला नेहरू शिशु विहार। अचरज होगा आदरणीय प्रभावती जी ने स्कूल के लिए प्रधानमंत्री नेहरू को व्यक्तिगत पत्र लिखा था। आर्थिक सहयोग के लिए। ऐतिहासिक पत्र आज भी धरोहर है कदमकुआं में। विषयांतर हो गया था। बहकने के लिए क्षमा करें। गोविंदचक से ढरण अपनी रिक्शा से पहलेजाघाट ले जाते। गांव से 2 किलोमीटर दूर पहलेजाघाट। फिर गंगा पार करना स्टीमर से जो आनंद देता था जिन लाहौर देख्यां नईं सा है। आह गंगा। वाह गंगा। अविरल गंगा। जय माँ गंगा। गांधी सेतु बनने के बाद खत्म हो गया स्टीमर से गंगा पार का आनंद, लीला।
ये क्या साउंड बॉक्स से पुरान प्यारा गाना बजने लगा-
ये दौलत भी ले लो शोहरत भी ले लो
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी मगर
मुझको लौटा दे बचपन का सावन
वह कागज़ की कश्ती वो बारिश का पानी।
वो गंगा पार स्टीमर से जाने की बातें…….
NK Singh: Really, Jin Lahore Nahin Dekhyan!

Rajeev Sharma: अहा… आनंदम

Om S Shrivastava Adv: बहुत अच्छा।

Aleem Uddin: Excellent article

Kumar Alok Pratap: Har lekh ek gudgudi to paida karti hai

Srijnesh Silakari: प्रभावी लेखनी । अपेक्षा है आपके नियमित स्तम्भ हमें मिलते रहेंगे।

Swati Sharma: It is great reading you after a long time

Shashi Shekhar: जब मैं टी. एन. बी. कालेज भागलपुर में पढ़ता तब स्टीमर से ही नौगछिया से गंगा पार होते थे… गंगा के घाट पर तब मुझे दही-चूड़ा या फिर मछली-भात का जो आनंद वहां मिलता था और कहीं नहीं… आपके लेख से वो यादें फिर ताजा हो गई है… मन फिर से गंगा किनारे दही-चूड़ा और मछली-भात खाने को मचलने लगा है। गंगा किनारे रेत पर फिर नंगे पैर चलने को मन करता है… बड़े नांव की सवारी और नविक की रौब वाली आवाज फिर से सुनने को मन करता है..
NK Singh: Nostalgia is always magical.
Shashi Shekhar: सर, सही कह रहे हैं आप…

Barun Sakhajee: बरबस ही अपनी ओर खींचते घाट। गंगा की अमर लहरें और स्मृतियों के उपवन की महकती सरस् खुशबू। सर बधाई। प्रतीक्षा रहेगी गैर-एयू राज्यों के आपके पाठकों तक यह बरास्ता फेसबुक यूं ही पहुंचता रहे।

Ajay Khare: बहुत ही रोचक वर्णन किया है सर आपने

Pushpendra Pal Singh: Badhiya Bhai Sahab

Aatm Deep: बहुत खूब ! बधाई आदरणीय

Atal Tiwari: आदरणीय सर इस तरह के लेख अखबारों में अब बहुत कम पढ़ने को मिलते हैं। इससे लोगों को क्षेत्र नदियां या विशेष स्थानों के बारे में अच्छी जानकारी हो जाती है और यह लेख पढ़ने में भी रोचक और ज्ञानप्रद है।

Sunil Sourabh: बहुत सुंदर

Ashok Kothari: Keep it up. Best Wishes

Pravin Kumar: यादगार संस्मरण. खगड़िया का पेड़ा , दही और मछली….
NK Singh: Only station where fish is available on railway platoforms.
Pravin Kumar: इसका अंदाज़ा नहीं था सर, शुक्रिया…

Amar Kumar: bahut badhiya

मुकेश पाण्डेय चंदन: मेरे नाना जी भी बताते थे, कि उनके गांव (जो बक्सर-बलिया जिले की सीमा पर है) से निकली गंगा से स्टीमर निकलते थे । स्टीमर वाले कम पानी वाली जगह के संकेत के लिए वहाँ बांस गाड़ते थे, जिसे गांव के बच्चे उखाड़ देते थे, फिर स्टीमर के फंसने पर स्टीमर वाले गांव वालों की मदद मांगते और बदले में खाने-पीने का सामान देते थे । सर बढ़िया रोचक लेख है ।
NK Singh: मुकेश पाण्डेय चंदन हमारी सामूहिक स्मृतियाँ
मुकेश पाण्डेय चंदन: नानाजी बताते थे, कि तब जलेबी चार आना पौवा होती थी । जलेबी वाला आवाज लगाता था –
जलेबी चार आना पौवा, पेट भरौआ ।
तब ददरी मेला, बलिया में बच्चे जलेबी खाने के चक्कर मे ही जाते थे ।

Mridul Sharma: प्रणाम सर, रोचक लेख।

Harish Dubey: बहुत प्रभावी लेखन, बधाई

Prince Gaba: बहुत ही प्रभावी लेखन और बेहद संजीदा विषय है सर। साधुवाद है आपकी लेखनी को। आपसे हमेशा कुछ नया सीखने को मिलता है।

Rajesh Thakur: जी सर, मैं भी मुंगेर घाट से कइयों बार जहाज से पार किया हूँ

Anil Sirvaiyya: Happy to read you after long time…Congratulations sir

Sandeep Kumar: Amazing , knowledgeable , many congratulations sir … Waiting for the next part

Shailendra Pandey: Good, congratulations

Raju Kumar: यादों का पिटारा। गंगा की प्रवाह की तरह।

Ashok Tomar: Sir on the steamer they used to also sale Makhan ki goli..
NK Singh: What was that? Please enlighten.

Nachiketa Desai: आपने मुझे पुराने दिनों की याद दिला दी। पटना से मेरे ससुराल मुजफ्फरपुर जाने के लिए पहलेजा घाट या महेनद्रु घाट से स्टीमर पकड़ कर गंगा पार हाजीपुर जाते थे और फिर मीटर गेज की ट्रेन से जाते थे। आपने समा बांध दी ।

Msazaad Azaad: Congrats Best wishes

Renu Sharma: Long time no see hope doing well take care

Roshan Kohli: Excellent description . Takes me back to era gone by when from Ramkola , Deoria Dist now understand it’s Padrauna , used to reach Patna by crossing Ganga on steamer .

Shailendra Tiwari: What a live description

Ghanshyam Das Agrawal: Very good

Keshav Pandey: Badhai

Om Thanvi: एक बार में इतना ही? सम्पादकजी, अस्थान बढ़ाओ!
NK Singh: संपादक को तो संपदाकाचार्य ही आदेश दे सकते हैं!

Laxman Bolia: आलेख के विस्तार का लय ही ऐसा है कि रूकने पर अखरता है। संपादक की मजबूरी … या कुछ… और ?

Saurabh Arya: रोचक संस्मरण…समय ऐसे ही तो दर्ज होता है, और पढ़ने की तलब जाग गई है

Vivek Savarikar Mridul: बहुत ही सरस चित्रण

Jaya Govindan: So correct you are NK.

Shishir Sharan: XCELLELNT SIR… AFTER A LONG INTERVAL. SAW YR REPORT

Naresh Dudani: बहुत-बहुत बधाई.

Neelam Tiwari: प्रभाष जी के बाद जनसत्ता जनसत्ता नहीं रह गया था

Vinod Sharma: अति सुन्दर

Sushil Kumar: स्वरतालमयी वीणा बजती, मिलती है बस,झंकार मुझे.. बहुत ही सारगर्भित आलेख सर

Chandu Gupta: Bahut sundar prastuti.. badhai

Arshad Ali Khan: बहुत शानदार…

Arif Mirza: बार बार पढ़ने को दिल चाहता है।

Praveen Kumar Khariwal: उम्दा

Sanjeev Acharya: बेहतरीन

Parsuram Sharma: इन दिनों के बेरस माहौल के बीच यह सरल, सरस और सुस्वादु लगा। धन्यवाद।

Ramesh Mishra Chanchal: लिखने में जो भाव है वो आत्मविभोर कर देते है

Ajay Bokil: सुंदर..

Dilip Singh Sikarwar: अद्वितीय

Shiv Narayan Dwivedi: मैं बिहार कभी नहीं गया पर पढ़ने से ही मन प्रसन्न होगया ।

डॉ. राहुल रंजन: बहुत बढ़िया आपने तो बचपन की याद दिला दी

Subash Arora: बहुत खूब

Ramanand Gupta: वाह बहुत शानदार

Devpriya Awasthi: बहुत शानदार और पठनीय लेख.

Lajpat Ahuja: रोचक,मधुर स्मृतियाँ

Krishna ballabh Prasad singh: बहुत बढ़िया

Devesh Kalyani: अद्भुत दृश्य उकेरा है ऐसा लगता है शब्दों ने पेंटिंग बनाई हो

Msazaad Azaad: Great picture

Shailendra Singh Bhadauria: Bahut khoob

Swayam Prakash: बार-बार पढ़ता हूँ, अतीत में खो जाता हूँ

नई पाती : चिठिया बाँचे सब कोई – 2 

आलेख – स्मृति के पुल: गंगा बहती हो क्यों. . . पार्ट 1

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2 Replies to “Comments : Ganga and her people, Part-1”

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