स्मृति के पुल : गंगा बहती हो क्यों . . . 1

A steamer near Pahleja Ghat, Bihar, Courtesy – Wikipedia

Ganga and her people – 1

NK SINGH

Published in Amar Ujala 23 January 2022

तब गंगा में लाशें नहीं तैरा करती थीं। स्टीमर चला करते थे। पटना में गंगा पर पुल बनने के बाद स्टीमर की यात्रा का रोमांस जाता रहा। पर आज भी जब गंगा टपने के लिए इस पुल से गुजरते हैं, नजर बरबस पहलेजा घाट की तरफ घूम जाती है।

वहाँ से किसी जमाने में ये स्टीमर चला करते थे। कानों में जहाज का भोंपू सुनाई देता है। … ए कुली, थोड़ा फुर्ती से, जहाज खुलने वाला है। छूट गया तो रात भर झूलते रहो।

अब तो पटना में गंगा टपने के लिए दो-दो पुल हो गए हैं, तीसरे की तैयारी है. पर पहले इसी पहलेजा घाट से पानी का जहाज पकड़कर ही नदी के उस पार जाया जा सकता था। Continue reading “स्मृति के पुल : गंगा बहती हो क्यों . . . 1”

स्मृति के पुल : गंगा बहती हो क्यों . . . 2

Sonpur Mela on Ganga bank, Courtesy – Heritage times

Ganga and her people – 2

NK SINGH

Published in Amar Ujala of 30 January 2022

एक लम्बे अरसे तक बिहार के जलमार्ग आवागमन के मुख्य संसाधन थे. इन नदियों में तब माल ढोने से लेकर यात्रिओं के आवागमन तक के लिए नावों के बेड़े चला करते थे। प्रसिध्द पत्रकार बी.जी.वर्गीज़ के मुताबिक एक समय ऐसा था जब अकेले पटना में ही ६२,००० नौकाएं रजिस्टर्ड थीं. तरह-तरह की नौकाएं. और तरह-तरह के यात्री.

यह तो सबको मालूम है कि १८५७ की क्रांति की विफलता के बाद अंग्रेजों ने हिंदुस्तान के आखिरी बादशाह बहादुर शाह जफर को देश निकाला दिया था और उस बदनसीब बूढ़े को कू-ए-यार में दफन होने के लिए दो गज जमीन भी नहीं मिली। पर लाल किले से कैसे उन्हे ले जाया गया था “उजड़े दयार” बर्मा तक? Continue reading “स्मृति के पुल : गंगा बहती हो क्यों . . . 2”

स्मृति के पुल : गंगा बहती हो क्यों . . . 3

Raj Kapoor and Waheeda Rehman in Shailendra’s immortal classic, Teesari Kasam, based on the love story of a bullock-cart driver and a nautanki artist

Ganga and her people – 3 

NK SINGH

Published in Amar Ujala 6 February 2022

पटना में १९८२ में गंगा पर पुल बनने के साथ ही पहलेजा घाट विस्मृति के गर्त में समा गया. उसके साथ ही पहलेजा घाट से सोनपुर तक चलने वाली घाट गाड़ी भी बंद हो गयी. आज ये सारी जगहें सुनसान और उजाड़ पड़ी हैं। तीसरी कसम वाले अपने हीरामन गाड़ीवान वहाँ का हाल देखते तो कहते . . .  इस्स . . . जा रे जमाना. ..  और बात को चासनी में डाल देते!

मीटर गेज की घाट लाइनों पर छुक-छुक चलती इन घाट गाड़ियों की अलग ही दास्तान है, जो रेल-इतिहासकारों को आज भी लुभाती हैं. इस घाट गाड़ियों का काम था मेन लाइन के स्टेशनों से यात्रिओं को जहाज तक पहुँचाना. आज भी इन घाटों के नाम रोमांच जगाते हैं. आज वीरान पड़े मनिहारी घाट, बरारी घाट, मुंगेर घाट ऐसी जगहें हैं जहाँ कभी दिन-रात चहल-पहल रहती थी. Continue reading “स्मृति के पुल : गंगा बहती हो क्यों . . . 3”

स्मृति के पुल : गंगा बहती हो क्यों . . . 4

Gangetic dolphins near Bhagalpur, Credit – Logical Bihar

Ganga and her people – 4 

NK SINGH

Published in Amar Ujala 13 February 2022

यात्रियों से खचाखच भरे और दिन-रात एक किनारे से दूसरे किनारे फेरी लगाने वाले ये जहाज, पुलों के बनने की वजह से एक के बाद एक बंद होते गए। पहले मोकामा, फिर पटना और उसके बाद भागलपुर में स्टीमर सर्विस बंद हुई।

स्कूल के दिनों में मैं भागलपुर से महज १५ किलोमीटर की दूरी पर, गंगा के दूसरे किनारे पर, नौगछिया में रहता था। दूरी महज 15 किलोमीटर की हो, पर नौगछिया से कभी भागलपुर जाना हो, तो दिन भर लग जाता था। नौगछिया से थाना बिहपुर की गाड़ी पकड़ो. फिर घाट लाइन की ट्रेन पकड़ कर बरारी घाट जाओ. वहां से भग्गू सिंह का जहाज पकड़ कर महादेव घाट. फिर टमटम-बस पकड़ कर भागलपुर.

गर्मियों में जब गंगा सिकुड़ जाती थी तो जहाज पकड़ने के लिए कई दफा बालू पर एक-एक कोस चलना पड़ता था.  जहाज पर चढ़कर सोंस (डॉल्फिन) देखने का रोमांच  काफूर !  नौगछिया में 1999 में पुल बन जाने के बाद अब 20 मिनट में भागलपुर पहुँच जाते हैं। Continue reading “स्मृति के पुल : गंगा बहती हो क्यों . . . 4”