छठ के बहाने अपने गाँव की छटा

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Getting nostalgic about Chhath

NK SINGH

गंगौर छोड़े हुए जमाना हो गया. बिहार से निकले हुए भी एक युग बीत गया. लगभग आधी सदी से परदेश की खाक छान रहा हूँ. इन दिनों भोपाल में हूँ. कहा जाता है कि इस शहर को राजा भोज (ईसा पूर्व १०१०-१०५५ ई.) ने बसाया था.

राजा भोज का नाम पहली दफा तब सुना था, जब अक्षर ज्ञान भी नहीं हुआ था. अंगुरी जितने बड़े अंगुरिया नामक बच्चे का विस्मयकारी किस्सा सुनने की चाहत अक्सर हमें घूरे के पास खींच लाती थी.

घूरे की आग ताप रहे बड़े-बूढ़े हमारा ज्ञान वर्धन करने के लिए घुट्टी रटाते थे. इस घुट्टी के दो प्रमुख पाठ थे. एक, राजा भोज हमारे पूर्वज थे. दो, हमारा हाल-मुकाम भले गंगौर हो, पर हमारा घर था, धारा नगरी.

धारा नगरी का संगीतमय नाम सुनकर उस ज़माने में हमें लगता था कि वह चंद्रकांता संतति के चुनार किले सी कोई रोमांचक जगह होगी. थोड़ी समझ आई तो पता चला कि मध्य प्रदेश के धार शहर का यह प्राचीन नाम था. धारा नगरी भोज साम्राज्य की राजधानी था.

पता नहीं किस भीषण युद्ध या प्राकृतिक आपदा के चलते परमारों के उस कुनबे ने कब धारा नगरी से पलायन किया. पर इतना पक्का था कि इंद्र सिंह और चन्द्र सिंह नामक दो भाइयों ने १५०० किलोमीटर का सफ़र तय कर बूढ़ी गंडक के किनारे गंगौर गाँव में अपना लाव-लश्कर डाला था.

जगह बड़ी सोच-समझ कर चुनी गयी थी. थोड़ी दूर आगे ही बूढी गंडक का मुहाना था, जहाँ वह गंगा में मिलती थी. अर्थात इफरात पानी. बचपन की मुझे याद है. बहियार में सात-आठ हाथ पर पानी निकल आता था. Continue reading “छठ के बहाने अपने गाँव की छटा”