The man who brought professionalism to Hindi journalism

 

DB Post 13 April 2017

NK SINGH

The invite had come in the name of Ramesh Chandra Agarwal, the chairman of Bhaskar group of publications. But, unlike most of the proprietors of regional newspapers, Rameshji did not jump at the opportunity to accompany the Prime Minister on his foreign trip.

Instead, he recommended my name —- I had just joined Dainik Bhaskar, DB Post’s sister publication —- and ensured that the invite was re-routed to include me in Atal Bihari Vajpayee’s official press party.

When I landed in New York in the fall of 2000 to cover the Prime Minister’s visit to USA, Switzerland and Germany, I was in for a surprise.

The media contingent was teeming with owner-editors of regional newspapers, particularly Hindi newspapers, eager to reap the double benefit of proximity to PM and a subsidised foreign junket.

It was then that I realised the importance of what Rameshji had done.

He was trying to introduce professionalism to the world of regional newspapers. He was bringing in professionals to run his newspapers, giving them freedom to experiment with the product, even if it meant curtailing his own power.

That is no mean sacrifice, as those familiar with regional newspaper world would tell you. He is the man who brought professionalism to the world of Hindi newspapers.

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रमेश चन्द्र अग्रवाल : क्षेत्रीय हिंदी पत्रकारिता में प्रोफेशनलिज्म का पुट

 

Ramesh Chandra Agarwal

Memoire: Ramesh Chandra Agarwal

30 Nov 1944 – 12 April 2017

NK SINGH

प्रधान मंत्री के साथ विदेश यात्रा का वह आमंत्रण दैनिक भास्कर  प्रकाशन समूह के चेयरमैन श्री रमेश चन्द्र अग्रवाल के लिए आया था। तब ऐसे आमंत्रण पाकर क्षेत्रीय अख़बारों के मालिकों की बांछें खिल जाती थी।

पर रमेश भाई साहेब –- भोपाल में सब उनके लिए भाई साहेब थे और वे सबके भाई साहेब थे –- अलग ही मिट्टी के बने थे। वह निमंत्रण ख़ुद स्वीकार करने की जगह उन्होंने अपनी जगह मेरे नाम की सिफ़ारिश की।

मैं इसलिए भी हैरत में था कि भास्कर ज्वाइन किए मुझे हफ़्ता भर भी नहीं हुआ था।

तत्कालीन प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की अमेरिका, जर्मनी और स्विस यात्रा को कवर करने सन २००० के आख़िरी दिनों में जब मैं न्यूयॉर्क पहुँचा तो तब मुझे भास्कर तथा अन्य क्षेत्रीय अख़बारों का फ़र्क़ मालूम हुआ।

आनंद बाज़ार पत्रिका जैसे कुछ प्रतिष्ठित मीडिया घरानों को छोड़कर ज़्यादातर क्षेत्रीय अख़बारों का, ख़ासकर हिंदी अख़बारों का, प्रतिनिधित्व उनके मालिक-सम्पादक कर रहे थे।

भास्कर तबतक ऐसे अख़बारों से ऊपर उठ चुका था। और इसका श्रेय रमेशजी की दूरदृष्टि तथा उनके विज़न को जाता है। वे अपने क्षेत्रीय भाषाई अख़बारों में प्रोफेशनलिज्म लाने में जुटे थे। उनके सारे व्यवसायों का नेतृत्व प्रोफ़ेशनल लोगों के हाथों में था.

मालिक-सम्पादक की परम्परा वाले क्षेत्रीय हिंदी अख़बारों के लिए यह तब भी बड़ी चीज़ थी, और कुछ अपवादों को छोड़कर आज भी है। प्रिंट लाइन में सम्पादक की जगह अपने नाम के मोह से वे ऊपर उठ चुके थे। Continue reading “रमेश चन्द्र अग्रवाल : क्षेत्रीय हिंदी पत्रकारिता में प्रोफेशनलिज्म का पुट”

प्रभाष जोशी के बहाने हिंदी पत्रकारिता पर एक नजर

New Delhi, 30 July 2008: Author at a function to release Prabhash Joshi’s books. Left to right: Namvar Singh, Prabhash Joshi, NK Singh

Prabhash Joshi

15 July 1937 – 5 November 2009

NK SINGH

नामवर सिंह अचम्भे में थे. और दिल्ली के उस खचाखच भरे सभागार में बैठे कई दूसरे लोग भी. अवसर था हिंदी के शीर्ष संपादक प्रभाष जोशी के पांच खण्डों में छपे लेखों के संकलन के विमोचन का. राजकमल प्रकाशन ने लगभग २१०० पेजों में फैले इस संकलन को 2008 में एक साथ रिलीज़ करने की योजना बनाई थी.

हिंदुस्तान के कई बड़े राजनेताओं से और मूर्धन्य पत्रकारों तथा लेखकों से प्रभाषजी की नजदीकी किसी से छिपी नहीं थी. मौजूदा चलन के हिसाब से —- और पब्लिसिटी के भी हिसाब से —- वे चाहते तो प्राइम मिनिस्टर या प्रेसिडेंट उनकी किताबों का विमोचन कर सकते थे. पर हमेशा की तरह प्रभाषजी ने इससे हट कर काम किया.

उन्होंने प्रकाशक से कहा कि उनकी किताब पांच पत्रकार रिलीज़ करेंगे. वे प्रचलित अर्थो में नामी पत्रकार नहीं थे. इन पत्रकारों में एक भी ऐसा नहीं था जो जिसकी उपस्थिति दूसरे दिन अख़बार की सुर्खियाँ बनती या जिसकी वजह से उन किताबों की चर्चा होती. ज्यादातर लोग ऐसे थे जो परदे की पीछे रहकर काम करते थे. Continue reading “प्रभाष जोशी के बहाने हिंदी पत्रकारिता पर एक नजर”