छठ: जड़ों से जुड़ने की छठपटाहट

Hindustan 2 November 2019

Amazing geographic spread of Chhath

NK SINGH

 

पिछले पचास-साठ सालों में बिहार के सामाजिक परिवेश में क्रांतिकारी परिवर्तन आया है. अपने पहरावे, रहन-सहन और खान-पान में यहाँ का आम आदमी पूरी तरह बदल चुका है.

धोती के ऊपर बुशर्ट पहनने का रिवाज ख़त्म हो गया है. गाँव में लाउडस्पीकर पर भोजपुरी या मैथिली के गानों की जगह आप पंजाबी पॉप सुन सकते हैं. चिकन या अंडा खाने पर अब न तो प्रायश्चित करना पड़ता है, न ही जाति से बाहर निकाले जाने का खतरा रहता है. पंडितजी की जगह अब बहनें राखी बंधने लगी हैं.

आधुनिकता की इस बयार का पारंपरिक छठ पूजा पर थोड़ा भी असर नहीं पड़ा है. उल्टे, पिछले कुछ दशकों में छठ के प्रति लोगों का आकर्षण इस कदर बढ़ा है कि आज यह पर्व सैकड़ों-हज़ार करोड़ रूपये के कारोबार में बदल गया है.

रेलवे देश के कोने-कोने से बिहार के लिए स्पेशल ट्रेनों का इंतजाम करता है. हवाई जहाज़ के टिकटों के दाम बढ़ जाते हैं. मुंबई का वाशी हो या दिल्ली का मयूर विहार, भोपाल का गोविन्दपुरा हाट हो या कोचीन का ब्रॉडवे बाज़ार, सब मिनी-बिहार में बदल जाते हैं. दुकानों में छठ पूजा में इस्तेमाल होने वाली सामग्री मिलने लगती है.

चुस्त जीन्स और झीना टॉप पहने आधुनिकाओं से लेकर सिलिकॉन वैली में कंप्यूटर के जटिल अल्गोरिथम से जूझ रहे इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी के महारथियों तक छठ के लोकगीतों का क्रेज इस कदर बढ़ा है कि वह अपने-आप में सैकड़ों करोड़ की इंडस्ट्री बन चुका है.

न्यूज़ चैनलों के एंकर सुग्गों की चोंच सोने और चांदी से मढाने में इतना मशगूल हो जाते हैं कि वे अक्सर भूल जाते हैं कि उनका काम छठ मैया का गुणगान करना नहीं, बल्कि दर्शकों तक ख़बरें पहुँचाना है. चेन्नई का समुद्र तट हो या चंडीगढ़ का तालाब, भोपाल का बड़ा ताल हो या कलकत्ता में हुगली का किनारा, देश के कोने-कोने में छठ की छठा छाई रहती है. Continue reading “छठ: जड़ों से जुड़ने की छठपटाहट”