अपनी सरकार गिरने पर अटल जी का इंटरव्यू

India Today (Hindi) 15 June 1996

Atal Bihari Vajpyee: Interview after fall of his Government in 1996

NK SINGH

बातचीत ■ अटल बिहारी वाजपेयी

‘‘हम मजबूत होकर उभरे हैं”

अटल बिहारी वाजपेयी भले ही मात्र 13 दिनों में पद छोड़ने पर बाध्य हुए हों, पर प्रधानमंत्री पद से वे ऐसे ठाठ से विदा हुए कि बहुतों के दिलों में छाप छोड़ गए। इस्तीफा देने के एक दिन बाद उन्होंने विषेष संवाददाता नरेंद्र कुमार सिंह से बातचीत में भाजपा के महत्वाकांक्षी दांव की वजहें गिनाईं। कुछ अंश:

भाजपा सरकार जल्दी ही गिरने से क्या कार्यकर्ता हतोत्साहित हुए हैं?

नहीं इससे उनके इरादे और मजबूत हुए हैं। हमें पता था कि हमारे पास पर्याप्त सांसद नहीं है। इसलिए हमें कोई आश्चर्य नहीं हुआ।

एक बार आपने कहा था कि करीब 220-225 सीट मिलने पर ही सरकार बनाएंगे फिर आपने इरादा क्यों बदला?

कुछ नेताओं का मानना था कि हमें सरकार नहीं बनानी चाहिए थी। पर दूसरे कुछ लोगों का मानना था कि हमें जिम्मेदारी से भागना नहीं चाहिए।

सबको मालूम था कि आपके पास बहुमत नहीं है। आप किस पर भरोसा कर रहे थे?

जब राष्ट्रपति ने मुझे सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया तब राजनैतिक स्थिति अस्थिर थी। क्षेत्रीय पार्टियों ने विकल्प खुले  छोड़ रखे थे। जनादेश के मद्देनजर हम साझा न्यूनतम कार्यक्रम के आधार पर क्षेत्रीय पार्टियों की मदद से सरकार बनाने की ईमानदारी से कोशिश करना चाहते थे।

क्या आप इन पार्टियों के भाजपा को बाहर करने के इरादे से चकित हुए?


हमने कांग्रेस को कभी अपना संभावित सहयोगी नहीं समझा। इसलिए किसी भी पार्टी को समर्थन देने का उसका फैसला हमारे लिए अहमियत नहीं रखता था। हां, हमें यह उम्मीद नहीं थी कि परस्पर विरोधी ताकतें एक हो जाएंगी। पर उसका मकसद हमें राज करने से रोकना था, भले ही उन्हें अपने सिद्धांतों को तिलांजलि देनी पड़े।

क्या आप मानते हैं कि यह आत्मघाती दांव था?


मुझे यकीन है कि विनाश की भविष्यवाणी करने वाले गलत साबित होंगे।

कहा जाता है कि स्पष्ट बहुमत के बिना सरकार बनाकर भाजपा ने सत्ता के प्रति अपनी भूख ही उजागर की है। आरोप है कि आपने ऐसे गुटों को फुसलाने की कोशिश की, जिन्होंने पहले ही देवेगौड़ा को समर्थन देने का फैसला कर लिया था।


नए गठजोड में उभरे महत्वपूर्ण नेता दुमुक के मुरासोली मारन ने संसद में कहा है कि भाजपा ने कभी सूटकेस की राजनीति नहीं की । साझा न्यूनतम कार्यक्रम के आधार पर विभिन्न क्षेत्रीय पार्टियों से समर्थन मांगन बिल्कुल जायज था।

पद पर बने रहने की खातिर आप अयोध्या में राम मंदिर, कश्मीर में अनुच्छेद 370 की समाप्ति और समान नागरिक संहिता जैसे विवादास्पद मुद्दो को ठंडे बस्ते में डालकर समझौते करने को तत्पर लगे।

समझौते का सवाल ही नहीं उठता। जनादेश स्पष्ट रूप् से कांग्रेस के खिलाफ था और राम मंदिर, अनुच्छेद 370 या समान नागरिक संहिता पर कई पार्टियों की राय हमसे अलग होने के बावजूद हम उनसे गठबंधन का प्रयास कर रहे थे।

आपने संयुक्त मोर्चे को तो सिद्धांतहीन गठबंधन कहा है, पर भाजपा और अकाली दल में क्या समानताएं हैं?

भाजपा और अकाली दल पहले भी सहयोगी रहे हैं। पर कांगे्रस ने माकपा, द्रमुक-टीएमसी और तेलुगु देशम से अब जो संबंध स्थापित किया है, वह इससे एकदम अलग है। इन पार्टियों ने कांग्रेस के कुशासन को खत्म करने का वादा किया था। पर अब उनमें से कुछ उसी पार्टी की मदद से सत्ता में आ रही हैं।

आपकी सरकार शुरू में ही हंसी का पात्र बनी, सिंकदर बख्त इसलिए नाराज हुए कि उन्हें नगर विकास जैसा कम महत्वपूर्ण मंत्रालय मिला।

मैं समझता हूं कि मेरी सरकार इतनी अल्पकालीन रहीं कि किसी भी शख्स के लिए मेरे सहयोगियिों के बारे में मूल्यपरक फैसला सुनना संभव नहीं।

आप जानते थे कि आपकी सरकार नहीं टिकेगी, फिर भी आपने श्रीकृष्ण आयोग के पुनर्गठन, एनराॅन बिजली परियोजना को दी गई प्रति गारंटी को फिर से मंजूरी जैसे कुछ महत्वपूर्ण फैसले कर डाले।

मेरी सरकार कामचलाऊ नहीं थी। फिर भी हमने नौकरशाही में कोई फेरबदल नहीं किया अथवा नीति संबंधी कोई प्रमुख फैसला नहीं किया। राय अलग होने के बावजूद हमने जम्मू-कश्मीर मे चुनाव कराने के पिछली सरकार के फैसले को बहाल रखा। महाराष्ट्र सरकार ने श्रीकृष्ण आयोग को जब भंग किया था, मैंने तभी अपनी अलग राय व्यक्त की थी। अगर हम दाभोल पाॅवर कंपनी को दी गई प्रति गारंटी को फिर से मंजूरी न देते तो वह मुकदमा कर देती। समझ नहीं आता कि मेरी स्वर्ण मंदिर यात्रा को कैसे नीति संबंधी महत्वपूर्ण फैसला माना जा सकता है।

आपने हमेशा आम सहमति की राजनीति की वकालत की है। आप अपने उत्तराधिकारी से किस तरह के संबंध रखेंगे?


वैसे ही जैसे किसी स्वस्थ लोकतंत्र में विपक्ष का नेता प्रधानमंत्री से रखता है।

India Today (Hindi)  15 June 1996

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