अटल जी की जादू जगाने की कला

Charisma of Atal Bihari Vajpayee

NK SINGH

भाजपा के प्रमुख प्रचारक और प्रधानमंत्री पद के उसके प्रत्याशी अटल बिहारी वाजपेयी अपनी चुनाव सभाओं में नागरिक सुविधाओं के नाम पर सरकारी कामकाज की खिल्ली कुछ इस तरह उड़ाते हैं:

मैं कहीं जा रहा था कि मैंने एक गड्ढा देखा।

मैंने पूछा,‘सड़क कहां है?‘

लोगों ने कहा,‘गड्ढे में

मैंने पूछा,‘गड्ढा कहां है?‘

उन्होंने कहा,‘सड़क में।

फिर मैंने एक व्यक्ति को उस गड्ढे में…. माफ कीजिएगा, सड़क पर स्कूटर चलाते देखा।

उसकी बीवी पिछली सीट पर बैठी थी। हर दो मिनट बाद वह पीछे मुड़कर उसे छूता था।

मैंने पूछा कि वह ऐसा क्यों कर रहा है।

उसका जवाब था,”मैं  आश्वस्त होना चाहता था  कि वह कहीं गिर तो नहीं गई।“

गोरखपुर, बिजनौर, मुरादाबाद में हर जनसभा में उनका यह चुटकुला लोगों को बहुत पसंद आया।

हाल के सर्वेक्षणों के मुताबिक 11वीं लोकसभा के चुनावों में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर सकती हैं। इन खबरों से उत्साहित भाजपा ने धमाकेदार अभियान छेड़ा है जिसके केंद्र वाजपेयी ही हैं।

पर वाजपेयी को मालूम है कि उन्हें फूंक फूंककर कदम उठाना होगा।

एक तो उन्हें केंद्र से इंका सरकार को हटाने के पार्टी के प्रयासों को ताकत देनी होगी, जिसका मतलब है अपनी मर्जी के विपरीत धुआंधार प्रचार में जुट जाना।

दूसरे, उन्हें अपनी ही पार्टी के कट्टरपंथियों से निबटना होगा।

मिसाल के तौर पर, पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की आम सहमति के बाद तैयार किए गए घोषणा पत्र में हिंदुत्व को विभिन्न चुनावी मुद्दों में से एक बताया गया है।

पर जिस दिन उन्होंने पार्टी अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी के साथ नई दिल्ली में घोषणा पत्र जारी किया उसी दिन पार्टी मुख्यालय ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर हिंदुत्व को अपना प्रमुख मुद्दा बताया।

अंततः वाजपेयी को हिंदुत्व पर जोर घटाने के लिए हस्तक्षेप करना पड़ा।

फिर उनके आलोचक और खासकर लाखों मुसलमान उन्हें उसी पार्टी का नेता मानते हैं जिसके कार्यकर्ताओं ने बाबरी मस्जिद गिराई और सांप्रदायिक आग लगाई। दरअसल, वे उनकी ‘उदार‘ छवि को समाचार माध्यमों, उनके अपने प्रयासों और पार्टी के जनसंपर्क प्रबंधकों की कोशिशों का परिणाम मानते हैं।

आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के महासचिव मौलाना निज़ामुद्दीन का कहना है,‘‘वे आरएसएस के बंधक ही होंगे। यह मत भूलिए कि वे भाजपा के घोषणा पत्र से बंधे हुए हैं और पार्टी ने अनुच्छेद 370 को खत्म करने, अल्पसंख्यक आयोग को भंग करने और धार्मिक और भाषायी अल्पसंख्यकों को विषेष दर्जा देने वाली धारा 30 को संषोधित करने का वादा किया है।“

निज़ामुद्दीन कहते हैं कि उन्हें ‘‘उदारवादी‘‘ के रूप में पेश करना भाजपा के ‘‘ढ़ोंग और दोमुंहेपन‘‘ का सबूत है।

वाजपेयी कबूल भी करते हैं कि उनकी पार्टी अल्पसंख्यकों का भरोसा नहीं जीत सकी है। और फिर भाजपा में भीतरी मतभेद भी उभरे हैं।

मसलन, स्वदेशी के मुद्दे पर, पिछले पखवाड़े, नई दिल्ली में भारतीय उद्योग महासंघ (सीआइआइ) की एक गोष्ठी को जब वाजपेयी और भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी ने संबोधित किया तो दोनों के लहजे और तेवर में स्पष्ट अंतर दिखा।

वाजपेयी के मुताबिक, स्वदेशी का मतलब है कि भारतीय उद्योग को दुनिया के उद्योगों से होड़ लेने में सक्षम होना चाहिए।

जोशी का कहना था कि स्वदेशी का मतलब है ‘‘भारतीय बनो, भारतीय खरीदो।‘‘

बहरहाल, कुछ समय के लिए पार्टी के भीतरी अड़ंगों को शांत कर दिया गया है और वाजपेयी का पूरा ध्यान चुनाव प्रचार पर लगा हुआ है।

तीन हफ्तों से वे खासकर उन्हीं के इसतेमाल के लिए किराए पर लिए गए आठ सीटों वाले बीचक्राफ्ट विमान से देश के कोने-कोने का दौरा कर रहे हैं।

वे एक दिन में चार से पांच जनसभाएं संबोधित करते हैं। उनका प्रचार कार्य सुबह आराम से 7 बजे षुरू होता है और शाम को सूरज डूबने के थोड़ी देर बाद ही खत्म हो जाता है।

हवाई जहाज में वे अपना समय अखबार पढ़ने और नई दिल्ली में पार्टी मुख्यालय से भेजे कागजात को देखते हुए बिताते हैं। इस बीच वे पत्रकारों से बातचीत के लिए भी वक्त निकालते है।

70 वर्षीय वाजपेयी खाने को लेकर जरा भी पूर्वाग्रही नहीं हैं। विमान में, सड़क के किनारे ढाबों में या फिर किसी पार्टी कार्यकर्ता के घर जो भी मिल जाए, वे खा लेते हैं।

देर रात तक चुनाव सभाओं पर चुनाव आयोग के प्रतिबंध से उन्हें राहत मिली है। उनके निजी सहयोगी शिव कुमार कहते हैं, ‘‘वे यही चाहते हैं। अपने एकांत को वे पूरी अहमियत देते हैं।‘‘

वाजपेयी और उनकी पार्टी के दूसरे नेताओं की प्रचार शैली में कोई समानता नहीं है। वे कभी उत्तेजित नहीं होते।

आखिर वे 12 बार चुनाव लड़ चुके है। जिसमें कुछ जीते हैं और कुछ हारे । और संभवतः इसी खूबी के चलते उनके प्रतिद्वंद्वी भी उन्हें पसंद करते हैं।

करीब चार दह्सक पहले लखनऊ से उन्होंने अपना पहला चुनाव लड़ा था और हार गए थे। तब वे जनसंघ में थे और महज अपनी पार्टी की मौजूदगी का एहसास कराने के लिए चुनावी अखाड़े में उतरे थे।

वाजपेयी बताते हैं, ‘‘उन दिनों हम अपनी पार्टी को मिलने वाली संसदीय सीटों को नहीं गिनते थे। हमें सिर्फ अपने वोटों की संख्या की फिक्र रहती थी।‘‘

वाजपेयी की सबसे बड़ा आकर्षण उनकी भाषण कला है। वे मंजे हुए अभिनेता की शैली में बोलते हैं।

भारत के नीरस नेताओं के बीच वाजपेयी संभवतः इकलौते व्यक्ति हैं जो मंच पर अपने इर्द-गिर्द खड़े कमांडो तक को अपनी बातों से हंसा देते हैं।

वाजपेयी की कार्यसूची में केवल राम मंदिर ही नहीं है। वे भ्रष्टाचार, राजनीति के अपराधीकरण, महंगाई, गरीबों की अनदेखी और जनजीवन से संबंधित अन्य मुद्दों पर भी बात करते हैं जो लोगों के दिलों को छू जाती है।

पिछले पखवाड़े उन्होंने पश्चिमी और उत्तरी राज्यों के दौरों, यहां तक कि उत्तर प्रदेश में भी मंदिर मुद्दे का शायद ही जिक्र किया।

हालांकि वे स्वदेशी की बात करते हैं पर चिलचिलाती धूप वाले दिन प्यास बुझाने के लिए पेप्सी की मांग भी कर बैठते हैं।

ऐसी पार्टी में, जहां आप अगर दोस्त नहीं हैं तो आपको दुश्मन समझा जाता हो, वाजपेयी सबसे अलग हैं।

वे आम सहमति की राजनीति के पक्षधर हैं।

वे कहते हैं, ‘‘इसे सिर्फ सहमति की राजनीति नहीं समझना चाहिए। इसका मतलब नीतियों पर व्यापक सहमति है।‘‘

भाजपा के रणनीतिकारों का मानना है कि अगर त्रिशंकु संसद की स्थिति बनती है तो वाजपेयी काफी काम आएंगे।

पर उनकी शक्ति कभी-कभी कमजोरी भी साबित हुई है।

उनकी उदारवादी छवि का मतलब है कि वे आरएसएस की निगाह में हमेशा अच्छे नहीं हैं।

पार्टी प्रमुख के रूप में उनका कार्यकाल स्मरणीय नहीं रहा। उनकी जगह आडवाणी के आने के बाद ही भाजपा की किस्मत पलटी।

आरएसएस बहुत हद तक इस एहसास के चलते वाजपेयी को प्रमुखता देने पर मजबूर हुआ है कि वोट बटोरने के लिए हिंदुत्व का पत्ता ही काफी नहीं है।

इसके अलावा, पिछले वर्ष गुजरात भाजपा में संकट के दौरान जाहिर हो गया कि पार्टी में संभवतः वे इकलौते नेता हैं जो विरोधी गुटों को एक साथ रख सकते हैं।

बहरहाल, वाजपेयी का काम आसान नहीं है।

हालांकि पार्टी चुनावों में व्यस्त हैं पर गुजरात जैसे राज्यों में, जहां केशुभाई पटेल का गुट कथित तौर पर कम-से-कम पांच क्षेत्रों में पार्टी के अधिकृत उम्मीदवारों को हराने की फिराक में है, भाजपा के सामने गंभीर समस्याएं हैं।

उन्हें पार्टी के लिए काफी कुछ करना है। सभी राजनैतिक पार्टियों के नेता उन्हें पसंद करते हैं और उनका सम्मान करते हैं। अगर जरूरत पड़ी तो सबको मिलाने में वे काफी उपयोगी भी साबित होंगे।

उन्होंने पहले ही कह दिया है कि चुनाव बाद के परिदृष्य में भाजपा ‘‘इंका और क्मयुनिस्टों को छोड़कर‘‘ सबसे मदद ले सकती है।

बहरहाल, वाजपेयी के आलोचकों का कहना है कि उन्होंने आरएसएस नेतृत्व को कभी निराश नहीं किया है, भले ही उसने उन्हें अपने बयान से मुकरने को कहा हो।

अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस को उन्होंने पहले घेार अपमान बताया पर जब संघ बिरादरी ने उन्हें इस बयान के लिए फटकारा और उनकी अपनी पार्टी के कट्टरपंथियों ने उन्हें ‘‘आधा इंकाई‘‘ बताकर भाजपा से निष्कासित करने की मांग की तो वाजपेयी बयान से मुकर गए।

हाल ही में उन्होंने मुंबई दंगे  की जांच कर रहे श्रीकृष्ण आयोग को भंग करने के मुद्दे पर भी इसी तरह पलटा खाया।

कुछ महीने पहले वाजपेयी का कवि मन भावी प्रधानमंत्री की भूमिका सौंपे जाने से भले ही रो पड़ा होगा पर उनके सामने कोई उपाय है भी नहीं।

दरअसल, उन्होंने खुद को भावी प्रधानमंत्री के रूप में पेश करने के पार्टी के निर्णय को सही ठहराया है, “पश्चिम में शैडो प्राइम मिनिस्टर और शैडो मिनिस्टर होते हैं। तो हमारे यहां क्यों नहीं हो सकते?‘‘

जब एक पत्रकार ने उनसे पूछा कि वे दो निर्वाचन क्षेत्रों से लड़ने के लिए क्यों तैयार हो गए तो वाजपेयी का जवाब था कि उनकी पार्टी कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती। वे कहते हैं, ‘‘आजकल किसी छोटी घटना के चलते भी चुनाव रद्द किया जा सकता है।‘‘

जाहिर है, भाजपा के ‘भावी प्रधानमंत्री‘ यह जोखिम उठाना नहीं चाहेंगे।

INDIA TODAY (HINDI) 15 mAY 1996
India Today 15 May 1996
India Today (Hindi) 15 May 1996
India Today 15 May 1996
India Today 15 May 1996

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